
Saudi Arabia New Diplomacy: आखिर क्या है सऊदी अरब की नई कूटनीति? (AI Creative)
Saudi arab new diplomacy: पश्चिम एशिया की राजनीति इन दिनों तेजी से बदल रही है। एक ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ का सऊदी अरब दौरा चर्चा में रहा, वहीं अब तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन भी सऊदी अरब पहुंच चुके हैं। इसी दौरान तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं, जिसे कुछ जानकार 'इस्लामिक नेटो' तक कह रहे हैं। इस बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच फोन पर बातचीत भी हुई है। पहली नजर में ये घटनाएं अलग-अलग लग सकती हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी के केंद्र में सऊदी अरब की बदलती कूटनीतिक रणनीति है।
अब सवाल यह है कि आखिर सऊदी अरब एक साथ तुर्किये, पाकिस्तान, भारत और इजराइल जैसे अलग-अलग देशों के साथ रिश्ते क्यों मजबूत कर रहा है?
क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की विजन 2030 योजना का लक्ष्य केवल तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर निवेश, पर्यटन, तकनीक और वैश्विक व्यापार का केंद्र बनना है। इसके लिए सऊदी अरब को पश्चिम और पूर्व, दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने की जरूरत है। यही वजह है कि वह किसी एक शक्ति या गुट पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ समानांतर रिश्ते विकसित कर रहा है।
तुर्किये और सऊदी अरब के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव रहा। हालांकि हाल के वर्षों में दोनों देशों ने संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। एर्दोआन की यात्रा को रक्षा सहयोग, निवेश, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (SMDA) पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसमें नाटो (NATO) के आर्टिकल 5 जैसी शर्त शामिल है, यानी एक देश पर हमले को दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। अब खबर है कि तुर्किये भी इस पैक्ट में शामिल होने जा रहा है, और जेद्दा में इसका औपचारिक समझौता होने की संभावना जताई जा रही है।
यह पूरा घटनाक्रम अमेरिका-ईरान तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिर स्थिति और यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जारी हमलों की पृष्ठभूमि में हो रहा है। भारत के लिए यह चिंता का सबब इसलिए है, क्योंकि इससे पाकिस्तान को एक मजबूत सैन्य गठबंधन का समर्थन मिल सकता है, जिसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर पड़ सकता है।
भारत और सऊदी अरब के बीच ऊर्जा, निवेश, रक्षा और रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। इसके अलावा भारत, अमेरिका, यूरोप और पश्चिम एशिया को जोड़ने वाले इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को भी भविष्य की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में गिना जाता है।
ऐसे समय में जब सऊदी अरब तुर्किये और पाकिस्तान से भी संपर्क बनाए हुए है, भारत के लिए यह जरूरी है कि उसके रणनीतिक और आर्थिक हित मजबूत बने रहें। साथ ही, तुर्किये-सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस पैक्ट को लेकर भी नई दिल्ली की नजर बनी हुई है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर असर पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की फोन पर हुई बातचीत ऐसे समय हुई है, जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव अब भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। भारत लंबे समय से इजराइल और अरब देशों दोनों के साथ संतुलित संबंध रखने की नीति अपनाता रहा है।
शाहबाज शरीफ का सऊदी दौरा आर्थिक सहयोग और निवेश की उम्मीदों से जुड़ा माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अब किसी एक देश को प्राथमिकता देने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार सभी प्रमुख साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है।
दरअसल सऊदी अरब अब बहु-आयामी (Multi-Alignment) विदेश नीति अपना रहा है। उसका सीधा लक्ष्य है निवेश, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाना। भारत, तुर्किये, पाकिस्तान और इजराइल सभी के साथ उसके अलग-अलग हित जुड़े हुए हैं। पश्चिम एशिया की नई राजनीति में वैश्विक आर्थिक हित, सुरक्षा और कूटनीति साथ-साथ चल रहे हैं।
अब पश्चिम एशिया की राजनीति 'या तो हमारे साथ, या विरोध में' वाली नहीं रही। सऊदी अरब की कोशिश है कि वह भारत, तुर्किये, पाकिस्तान, अमेरिका और अन्य प्रमुख देशों के साथ अपने-अपने हितों के आधार पर समानांतर रिश्ते बनाए रखे। यही नई कूटनीति इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश मानी जा रही है।
Updated on:
07 Aug 2026 10:03 am
Published on:
07 Aug 2026 10:03 am
बड़ी खबरें
View Allसमाचार
ट्रेंडिंग
