
जानिए, भारत में इफ्तार के साथ कैसे जुड़ा पार्टी शब्द?
नई दिल्ली। मुसलमानों में धार्मिक रूप से मनाया जाने वाला रमजान पर्व चल रहा है। इसी के साथ भारत में इफ्तार पार्टी का दौर भी जोरों पर है। इस पार्टी को हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के रूप में जाना जाता है। लेकिन इफ्तार के साथ पार्टी शब्द कैसे जुड़ा इस बात को गिने चुने लोग ही जानते हैं। साथ ही यह अपने अर्थों में भी खरा उतरा या नहीं इसकी भी कोई परवाह नहीं करता। इसके बावजूद सभी के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर इफ्तार के साथ पार्टी शब्द कैसे जुड़ा?
इफ्तार क्या है ?
इफ्तार अरबी शब्द है। इसका अर्थ संध्या का नाश्ता है। इसका एक अर्थ व्रत का खोलना भी होता है। एक बात ध्यान देने की यह है कि रोजा वही खोलता है, जिसने पूरा दिन रोजा रखा हो।
भारत में इसके साथ पार्टी शब्द कब जुड़ा ?
इफ्तार के साथ पार्टी शब्द कब जुड़ा इसका कहीं कोई ऐतिहासिक और तार्किक प्रमाण नहीं है। जहां तक भारत में पार्टी शब्द का इफ्तार से जुड़ने के पीछे की बात है तो यह शब्द धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की वजह से जुड़ा। भारत में आजादी से पूर्व इसका उल्लेख नहीं मिलता है। लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री ने 1946 में घटी सांप्रदायिक हिंसा और बंटवारे के बाद हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए शाम के समय रोजा खुलवाने की रस्म शुरू की था। शुरुआती दौर में इसे एक पॉलिसी स्टंट के रूप में देखा गया लेकिन धीरे-धीरे रोजा खुलवाने का यही तरीका प्रचलन में इफ्तार पार्टी के रूप में सामने आया। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी के समय में इफ्तार पार्टी का चलन चरम पर था। उसके बाद गठबंधन सरकार जैसे कि वीपी सिंह, एचडी देवगौडा, इंद्र कुमार गुजराल, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी ये चलन जोरदार तरीके से जारी रहा। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इफ्तार पार्टी देने का सिलसिला कायम रखा। लेकिन 2014 में पीएम नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं तब से इफ्तार पार्टी का सिलसिला पहले जैसा नहीं रहा।
इफ्तार पार्टी की आड़ में क्यों खुलवाते हैं रोजा?
वास्तव में ऐसी पार्टियों के पीछे पंडित नेहरू का मकसद हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को बढ़ावा देना था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्टी का प्रचलन तो समय के साथ आम लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया पर हम मकसद को पाने से उतना ही दूर होते गए। जानकारों का कहना है कि इसने भाईचारे के बदले हिंदू-मुस्लिम के बीच विभेद पैदा कर दिया। यह विभेद इन दिनों चरम पर है। यहां तक कि मॉब लिचिंग में अखलाक और पहलू खान जैसे मामले को उसी का ही परिणाम माना जाता है। लेकिन इन बातों को जानते हुए भी कोई भी राजनीतिक दल इससे परदा हटाने को राजी नहीं है। हुआ यह कि जब पीएम मोदी और सीएम योगी ने इफ्तार पार्टी के प्रति अनिच्छा दिखाई तो भी इसे सही संदर्भों में लेने के बजाय इसकी व्याख्या इस रूप में हुई कि वर्तमान सरकार को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं है। ऐसा इसलिए कि इफ्तार पार्टी नेहरू से लेकर अब तक के काल में अपने मकसद को छू तक नहीं सकता। इसके बावजूद भारत में इन सभी बातों को बड़ी मक्कारी से दबा दिया जाता है।
Published on:
4 Jun 2018, 3:04 PM IST
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