
लेफ्ट का सूरज अब डूबने की ओर, क्या कन्हैया कुमार बनेंगे उम्मीद की नई किरण ?
नई दिल्ली। गरीबी और दमन की आवाज बनने वाला वामपंथ अब खुद ही आवाज तलाश रहा है। देश से गरीबी हटी हो या नहीं लेकिन लेफ्ट से गरीब जरूर हट गए हैं। संसद में कभी 10 फीसदी सीटों वाला वामपंथ अब 10 सांसदों पर सिमट गया हैं। वामपंथ की प्रतिष्ठा दांव पर है। ऐसे में लेफ्ट की चर्चा बंगाल, त्रिपुरा और केरल में नहीं सिर्फ बेगूसराय में हो रही है। बेगूसराय में कन्हैया कुमार के जरिए वाम अपनी जमीन फिर से तलाश रहा है। क्योंकि बेगूसराय वाम का कई दशकों तक गढ़ रहा है। शत्रुघ्न सिंह यहां से वाम के आखिरी वारिस थे। लेकिन मजबूत उम्मीदवार नहीं मिलने से यह सीट हाशिए पर चली गई। जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की युवाओं में पैठ को देखते हुए सीपीआई ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया।
कन्हैया लेफ्ट का पोस्टर बॉय
कन्हैया कुमार फिल्हाल लेफ्ट के पोस्टर बाॅय हैं और बेगूसराय में उनकी मौजूदगी से लेफ्ट भी गदगद है। क्योंकि बेगूसराय में गिरिराज सिंह को कन्हैया कुमार मजबूत टक्कर देते दिखाई दे रहे हैं। ये हाशिए पर गए लेफ्ट के लिए डूबते को तिनके के सहारे के सामन है। राजनीति में लेफ्ट के कम हो रहे प्रभाव को लेकर वाम नेता सुभाषिनी अली से मोबाइल पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने मीटिंग में जाने का हवाला देते हुए बात करने से इनकार कर दिया।
बिहार में वामदलों को दो सीटों से उम्मीद
बिहार में लेफ्ट पहली बार क्षेत्रीय दलों से अलग अपनी नीति बदलकर एक मंच पर हैं। सीपीआई, सीपीएम और भाकपा (माले) प्रदेश के चुनावी इतिहास में एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले बिहार में सीपीआई का आरजेडी के साथ दो दशकों से ज्यादा का गठबंधन था। वाम दलों के नेताओं का दावा है कि बिहार में इस बार असर दिखने वाला है। नेताओं को दो सीटों पर तो पासा पलटने की उम्मीद है। बेगूसराय और आरा से पार्टी कुछ ज्यादा ही उम्मीद है।
वामपंथ का आखिरी किला है केरल
एक वक्त केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में वामपंथी दलों का अच्छा प्रभाव हुआ करता था, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ वामपंथी दलों का अस्तित्व भी कमजोर होने लगा। 2004 में सीपीआई और सीपीएम के पास लोकसभा में 53 सीटें थीं। वहीं 2009 में 20 सीटें हो गई थीं, जबकि 2014 में 10 सीटों पर सिमट गईं। त्रिपुरा और बंगाल से तो पार्टी का सफाया हो चुका है। सिर्फ केरल में सरकार बची हुई है। हम जिस लेफ्ट के आखिरी किले की बात कर रहे हैं, वह केरल है।
लेफ्ट के गढ़ में भाजपा-कांग्रेस की सेंध
मार्क्सवादी कॉम्युनिस्ट पार्टी, (माकपा) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने गठबंधन के तहत 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। अगर माकपा-भाकपा सियासी समीकरणों के मुताबिक जीतने में सफल होते हैं तो किला ढ़हने से बच सकता है। अगर नहीं तो इनके लिए गढ़ बचाना मुश्किल होगा। क्योंकि भाजपा और कांग्रेस सेंध लगाने में पीछे नहीं हैं। भाजपा केरल में सबरीमाला के जरिए राज्य में खाता खोलने की तैयारी कर रही है। वहीं कांग्रेस राहुल गांधी के सहारे जमीन मजबूत करने में जुटी है। जानकारों का मानना है कि केरल में भाजपा का प्रभाव बढ़ा है। आने वाले एक दशक में लेफ्ट सड़कों पर तो दिखेगा, लेकिन सत्ता में नहीं रहेगा।
इन वजहों से लेफ्ट हुआ कमजोर
लेफ्ट का वोटबैंक कम होने का सबसे बड़ा कारण है उनकी नीतियां। लेफ्ट शासित राज्यों में बेरोजगारी दर बढ़ने से युवाओं का रुझान लेफ्ट से कम होता चला गया। जिसकी वजह से युवा वोटर लेफ्ट का साथ छोड़ने लगा। उद्योग के लिए स्पष्ट और साफ नीति नहीं होने के चलते उद्योगपतियों ने भी वाम शासित राज्यों में कारोबार बंद कर दिया, जिससे पलायन का ग्राफ बढ़ने लगा और लोगों में लेफ्ट के प्रति नाराजगी बढ़ती चली गई। ऐसे में लेफ्ट की राजनीतिक जमीन सिमटती चली गई और वोटर दूसरे दलों का हाथ थामते चले गए। बेरोजगारी, पलायन और गरीबी को ही दूसरे दलों ने लेफ्ट के खिलाफ मुद्दा बना लिया।
अस्तित्व बचाना सबसे बड़ी चुनौती
देश की जनसंख्या में 65 फीसदी युवा हैं। कभी वामदल युवाओं के दम पर सियासत में अपनी पहचान रखते थे, आज उसकी बुनियाद हिल चुकी है। उसके लिए अपना अस्तित्व बचाए रखना बड़ी चुनौती है। इस चुनाव में युवा ही देश की दिशा और दशा तय करने वाले हैं। ऐसे में वाम नेता समझ चुके हैं कि वामपंथ का खोया जनाधार युवा ही वापस ला सकते हैं। आम चुनाव में अस्तित्व बचाए रखने की आखिरी लड़ाई में उतरा लेफ्ट कामरेड कन्हैया कुमार काे सेनापति बनाकर अपनी खोई जमीन तलाशने की कोशिश में है।
Published on:
01 May 2019 07:02 am
