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Explainer: बंगाल की दुर्गापूजा और राजनीति,अमित शाह के प्रस्तावित पूजा-पंडाल दौरे के राजनीतिक संकेत क्या हैं?

बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद अमित शाह का प्रस्तावित दुर्गापूजा दौरा सांस्कृतिक पहचान और नई सत्ता की राजनीतिक रणनीति का महत्त्वपूर्ण संकेत बन गया है। सवाल यह है कि क्या भाजपा बंगाल की परंपराओं से संवाद बढ़ाएगी या पंडालों में बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा उत्सव की सामुदायिक पहचान को प्रभावित करेगी?
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MI Zahir

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Oct 14, 2026

Bengal Puja Politics News

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद अमित शाह का प्रस्तावित दुर्गापूजा पंडाल दौरा संस्कृति और सियासत के बदलते रिश्तों को लेकर चर्चा में है। ( फोटो डिजाइन : ChatGPT)

बंगाल की दुर्गापूजा सिर्फ़ देवी की आराधना नहीं, बल्कि मिट्टी की ख़ुशबू, ढाक की थाप, शिल्पकारों की कल्पना और सामूहिक स्मृतियों का उत्सव है। मगर इस बार कोलकाता की जगमगाती सड़कों पर राजनीति का रंग भी बदला हुआ है। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार की यह पहली दुर्गापूजा है। ऐसे समय में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का प्रस्तावित दौरा महज़ धार्मिक यात्रा से कहीं अधिक राजनीतिक महत्त्व रखता है।

17 और 18 अक्टूबर को कहां जाएंगे अमित शाह?

14 अक्टूबर तक उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार, अमित शाह 17 अक्टूबर की रात कोलकाता पहुंचेंगे। अगले दिन बेलूड़ मठ में दर्शन के बाद हावड़ा के बाली देशबंधु क्लब, चेतला 24 पल्ली, शोभाबाज़ार राजबाड़ी और श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब के पूजा आयोजनों में शामिल होने की योजना है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के भी उनके साथ रहने की संभावना जताई गई है। प्रस्तावित कार्यक्रम को अंतिम दौरा मानना जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से बदलाव संभव हैं।

पिछले साल मांगा था परिवर्तन, अब सत्ता की परीक्षा

इस दौरे को समझने के लिए 26 सितंबर 2025 की घटना महत्त्वपूर्ण है। तब अमित शाह ने कोलकाता के संतोष मित्रा स्क्वायर में 'ऑपरेशन सिंदूर' विषय पर बने दुर्गापूजा पंडाल का उद्घाटन किया था। उन्होंने प्रार्थना की थी कि विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल में ऐसी सरकार बने, जो 'सोनार बांग्ला' का निर्माण कर सके। उस समय भाजपा विपक्ष में थी। अब सत्ता परिवर्तन हो चुका है। इसलिए राजनीतिक संदेश भी बदल गया है—जो वादा पहले चुनावी आकांक्षा था, वह अब शासन की जवाबदेही का सवाल है।

बंगाल की सत्ता और दुर्गापूजा के बदलते रंग

वर्षराजनीतिक संदर्भप्रमुख संकेत
2011तृणमूल सत्ता मेंनई राजनीतिक पहचान
2019भाजपा का विस्तारसांस्कृतिक सक्रियता
2021तृणमूल की वापसीक्षेत्रीय अस्मिता
2022यूनेस्को मान्यता के बादवैश्विक पहचान
2025शाह का पूजा उद्घाटनपरिवर्तन का आह्वान
2026भाजपा सरकारशासन की जवाबदेही

स्रोत: निर्वाचन आयोग के विधानसभा चुनाव परिणाम, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अभिलेख तथा दुर्गापूजा के सांस्कृतिक इतिहास पर उपलब्ध दस्तावेज़।

ममता बनर्जी की सांस्कृतिक विरासत के सामने नई चुनौती

पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शासन में दुर्गापूजा राज्य की सांस्कृतिक छवि और राजनीतिक संवाद का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनी। पूजा समितियों को सरकारी सहायता, उत्सव से जुड़े सार्वजनिक आयोजन और कोलकाता की उत्सवी पहचान को तृणमूल शासन की नीतियों में स्थान मिला। भाजपा के सामने अब चुनौती केवल इस विरासत को बदलने की नहीं, बल्कि ऐसी सांस्कृतिक नीति विकसित करने की है जो अलग-अलग विचारधाराओं वाले आयोजकों और नागरिकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करे।

'ऑपरेशन सिंदूर' से विरासत के मंदिरों तक संदेश

वर्ष 2025 में सैन्य अभियान पर आधारित पंडाल ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सांस्कृतिक मंच से जोड़ा था। इस बार प्रस्तावित कार्यक्रम में बेलूड़ मठ, पारंपरिक शोभाबाज़ार राजबाड़ी और सामुदायिक पूजा समितियों की उपस्थिति दिखाई देती है। राजनीतिक दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण बदलाव है। भाजपा अब केवल राष्ट्रवादी प्रतीकों के सहारे नहीं, बल्कि बंगाल की अपनी आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परंपराओं के साथ संवाद करती हुई दिखाई देना चाहती है। हालांकि दौरे का वास्तविक राजनीतिक उद्देश्य क्या है, इसका अंतिम आकलन नेताओं के बयानों और गतिविधियों के बाद ही संभव होगा।

पंडाल में आस्था, बाहर सियासत की नई चुनौती

बंगाल में पूजा समितियां केवल धार्मिक आयोजन नहीं करतीं। वे स्थानीय समाज, कलाकारों, व्यापारियों और स्वयंसेवकों को भी जोड़ती हैं। कुछ आयोजनों से राजनीतिक नेताओं का पुराना संबंध रहा है, लेकिन हर समिति को किसी दल का समर्थक मानना उचित नहीं। भाजपा सरकार बनने के बाद असली परीक्षा यह होगी कि सरकारी सहयोग और प्रशासनिक सुविधाओं का वितरण निष्पक्ष रहता है या नहीं। यदि किसी पंडाल को उसकी राजनीतिक निकटता के कारण अधिक लाभ मिलता है, तो सांस्कृतिक स्वायत्तता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रंग बदले, लेकिन क्या प्रशासन की प्राथमिकताएं भी?

कोलकाता की सड़कों पर इस बार नई रंग-सज्जा भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी है। पहले की नीली-सफ़ेद पहचान से अलग कई स्थानों पर बहुरंगी अल्पनाएं और सजावट की जा रही हैं। राज्य की नगर विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल भी सौंदर्यीकरण अभियान में शामिल हुईं। कांग्रेस और वाम दलों ने सार्वजनिक धन के इस्तेमाल और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए हैं। यह बहस केवल सजावट की नहीं, बल्कि इस बात की है कि नई सरकार अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाने के लिए सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करती है।

पंडालों में दिखती राजनीति की 6 परतें

मुद्दाभाजपा की चुनौतीजनता का सवाल
सांस्कृतिक पहचाननई स्वीकार्यतापरंपरा सुरक्षित?
पूजा समितियांसमान सहयोगनिष्पक्ष व्यवस्था?
राष्ट्रवादसंदेश का विस्तारउत्सव स्वतंत्र?
सरकारी खर्चपारदर्शितापैसा कहां लगा?
पर्यटनबेहतर सुविधाएंकलाकारों को लाभ?
राजनीतिक संवादस्थायी संपर्कटकराव या सौहार्द्र?

चुनावी जीत से आगे अब कितनी बड़ी है ज़िम्मेदारी?

विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत बड़ी राजनीतिक उपलब्धि रही, लेकिन चुनाव जीतना और सांस्कृतिक स्वीकार्यता हासिल करना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। निर्वाचन आयोग के उपलब्ध परिणामों में भाजपा की 207 और तृणमूल कांग्रेस की 80 सीटें दर्ज हैं। परिणामों में कुल 293 सीटों की स्थिति दिखाई गई है। इस जनादेश ने भाजपा को शासन का अवसर दिया है, मगर बंगाल की बहुलतावादी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति संवेदनशील रहने की ज़िम्मेदारी भी बढ़ाई है।

क्या तृणमूल कांग्रेस अब सांस्कृतिक विपक्ष बनेगी?

सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका भी बदल चुकी है। पहले उसके नेताओं को सरकारी आयोजनों, पूजा समितियों और प्रशासनिक निर्णयों के साथ जोड़कर देखा जाता था। अब विपक्ष में रहते हुए पार्टी के सामने सांस्कृतिक स्वायत्तता, सरकारी ख़र्च, सुरक्षा और स्थानीय परंपराओं जैसे मुद्दे उठाने का अवसर है। हालांकि किसी एक दल को बंगाली संस्कृति का एकमात्र प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। बंगाल की सांस्कृतिक पहचान राजनीतिक दलों से कहीं पुरानी और व्यापक है।

आस्था को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से कितना अलग रख पाएंगे?

दुर्गापूजा का सबसे बड़ा आकर्षण उसकी सामुदायिकता है। एक ही पंडाल में अलग-अलग राजनीतिक विचार रखने वाले नागरिक दर्शन करते हैं, कलाकार अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करते हैं और छोटे कारोबारी रोज़गार कमाते हैं। इसलिए नेताओं की मौजूदगी अपने आप में अनुचित नहीं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब उत्सव के आयोजन और संसाधनों पर किसी एक राजनीतिक पहचान का वर्चस्व स्थापित होने लगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सांस्कृतिक भागीदारी और राजनीतिक नियंत्रण के बीच यही बुनियादी अंतर है।

ढाक की थाप से बड़ा नहीं होना चाहिए सत्ता का शोर

अमित शाह का प्रस्तावित दौरा नए बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक बनकर उभरा है। पिछले वर्ष उन्होंने सत्ता परिवर्तन की कामना की थी; इस वर्ष उनकी पार्टी के सामने उस परिवर्तन को सार्थक साबित करने की चुनौती है। भाजपा के लिए यह दौरा सांस्कृतिक संवाद का अवसर है, तो तृणमूल कांग्रेस के लिए नई सरकार की नीतियों को परखने का। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सेदार बंगाल का वह नागरिक है, जिसके लिए दुर्गापूजा किसी सरकार का उत्सव नहीं, अपनी साझा विरासत का उत्सव है। राजनीति के रंग आते-जाते रहेंगे; मां दुर्गा की प्रतिमा गढ़ने वाले कुम्हार की मिट्टी और ढाक की थाप में बसने वाली बंगाल की आत्मा बनी रहनी चाहिए।