
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
यह दशक (2017–2026) भारतीय किसान आंदोलन की एक नई पहचान बनकर उभरा है। वह सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि एक नए सामाजिक अनुबंध की मांग है। मंदसौर की गोलीबारी से शुरू हुई यह यात्रा अब “जनादेश का नया पैमाना” बन चुकी है, जहां किसान केवल उत्पादन नहीं, बल्कि अपनी उपज का न्यायसंगत मूल्य, कानूनी सुरक्षा और नीति निर्माण में भागीदारी चाहते हैं।
किसानों की आवाज ने भारतीय राजनीति में एक स्थायी राजनीतिक मूल्य स्थापित किया है। यह सिर्फ एक सामाजिक आंदोलन नहीं रहा, बल्कि समय के साथ एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत बनकर उभरा है। आइए इस कहानी से समझें कि कैसे किसान आंदोलन ने सत्ता की जमीन पर अपनी जगह बनाई और इसका असर आज भी क्यों कायम है?
6 जून 2017 को मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों की पुलिस गोलीबारी ने आंदोलन को स्थानीय से राष्ट्रीय विमर्श में बदल दिया। यह वह मोड़ था जहां किसान केवल कर्ज या मूल्य की मांग तक सीमित नहीं रहे, बल्कि बाजार संरचना, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और कृषि नीति में भागीदारी की मांग उठने लगी।
2020–21 में 3 कृषि कानूनों की वापसी आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ। 2024–26 के शंभू–खनौरी चरण में किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज राहत, पेंशन और अन्य लंबित मांगों को लेकर फिर सामने आए। इस दौर में आंदोलन का नेतृत्व अब कई संगठनों और नेताओं के नेटवर्क द्वारा हो रहा है, जैसे- राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल, दर्शन पाल, जगजीत सिंह डल्लेवाल आदि।
सरकार का कहना है कि 2018–19 से सभी अधिदेशित फसलों के लिए एमएसपी उत्पादन लागत से कम-से-कम 50% अधिक रखा जा रहा है और यह नीति जारी है। लेकिन किसान संगठन स्वामीनाथन आयोग के सी‑2 लागत सूत्र पर आधारित 50% लाभ की कानूनी गारंटी चाहते हैं। इस संघर्ष का केंद्र अब सिर्फ मूल्य नहीं, बल्कि वह मूल्य है जो कानून द्वारा सुरक्षित हो यानी किसान का आर्थिक अधिकार।
2020–21 जैसा व्यापक राष्ट्रीय एकता अब नहीं दिखी। आंदोलन का मुख्य आधार पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहा। 17 अगस्त 2026 को “किसान बचाओ पदयात्रा” खनौरी सीमा पर रोकी गई, जिसके बाद जिला-स्तरीय प्रदर्शन और देशव्यापी विरोध कार्यक्रमों की घोषणा हुई। साथ ही, वैश्विक व्यापार समझौतों में कृषि की स्थिति, आयात शुल्क, डेयरी और खाद्य संप्रभुता जैसे विषय भी किसान विमर्श में शामिल हो गए।
यह आंदोलन केवल कानूनों के खिलाफ नहीं, बल्कि कृषि नीति में किसान की सहमति और भागीदारी की मांग है- एक लोकतांत्रिक सवाल कि नीति केवल तकनीकी निर्णय नहीं हो सकती, उसमें किसान की आवाज भी होनी चाहिए। तीन कृषि कानूनों की वापसी एक बड़ी जीत थी, लेकिन असली प्रश्न अभी भी बाकी है कि किसान की टिकाऊ और सम्मानजनक आय कैसे सुनिश्चित हो?
किसान आंदोलनों ने केवल मांगें नहीं उठाईं, बल्कि सामाजिक गठजोड़ भी बनाए। उत्तर प्रदेश के भैंसवाल गांव में किसान पंचायत में लगभग 20,000 लोग जुटे।। यह दिखाता है कि आंदोलन ने ग्रामीण राजनीति में नए गठजोड़ बनाए, जैसे- जाति और धार्मिक सीमाओं को पार कर एक साझा मंच तैयार करना। राजनीतिक दलों के साथ किसानों का रिश्ता जटिल रहा है। शुरुआत में किसान आंदोलन गैर-पार्टीजन दबाव समूह थे, लेकिन धीरे-धीरे BKU जैसे संगठन चुनावी राजनीति में शामिल हुए, जिससे आंदोलन और पार्टी राजनीति के बीच तनाव पैदा हुआ
Updated on:
21 Oct 2026 07:05 pm
Published on:
21 Oct 2026 07:05 pm
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