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सवाल सरकार और श्रद्धालुओं, दोनों से बहुत हैं…

महाकुंभ हादसा: आस्था, भीड़ और अव्यवस्थाओं के बीच एक त्रासदी, हमने पुराने हादसों से कुछ नहीं सीखा। पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार योगेश मिश्र का लेख.
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जयपुर

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Hemant Kumar Pandey

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Updated: 30 Jan 2025, 9:54 AM IST

2025 का महाकुंभ 144 वर्ष का विशेष आयोजन है। बहुत ही बड़े पैमाने पर सब कुछ आयोजित किया जा रहा है। यूपी सरकार के दावे हैं कि भीड़ से लेकर हर चीज को कंट्रोल करने के लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है।

2025 का महाकुंभ 144 वर्ष का विशेष आयोजन है। बहुत ही बड़े पैमाने पर सब कुछ आयोजित किया जा रहा है। यूपी सरकार के दावे हैं कि भीड़ से लेकर हर चीज को कंट्रोल करने के लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है।

चालीस दिनों तक चलने वाला महाकुंभ 2025 अभी आधा भी नहीं बीता कि एक बड़ा हादसा हो गया, जिसकी आशंका पहले से थी। प्रयागराज में कुंभ की जिम्मेदारी यूपी सरकार के पास है। सरकार ने सुरक्षा-भीड़ प्रबंधन के लिए अत्याधुनिक तकनीक के दावे किए थे, लेकिन असंख्य श्रद्धालुओं की भीड़ और अव्यवस्थाओं के कारण त्रासदी टाली नहीं जा सकी। पहले टेंट जले, सिलेंडर फटे और अब भगदड़ में कई लोग हताहत हुए। इस तरह की आपदा का ठीकरा किसी एक पर फोड़ देना सही नहीं होगा क्योंकि कई छोटी-बड़ी गलतियां मिलकर इस तरह के हादसे को अंजाम देती हैं। कुंभ के साथ हादसों का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। सन 1954 में प्रयागराज, 2013 में प्रयागराज, 2010 में हरिद्वार, 2003 में नासिक, 1992 में उज्जैन- इन कुंभ आयोजनों में भगदड़ हुई थी, कई लोगों की मौत हुई थी तथा कई घायल भी हुए थे।


2025 का महाकुंभ 144 वर्ष का विशेष आयोजन है। बहुत ही बड़े पैमाने पर सब कुछ आयोजित किया जा रहा है। यूपी सरकार के दावे हैं कि भीड़ से लेकर हर चीज को कंट्रोल करने के लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। पार्किंग, डाइवर्जन, बैरिकेडिंग, पुलिस वगैरह सब चाक चौबंद होने के ऐलान हैं। यह भी एक वजह है कि असंख्य लोगों के कदम कुंभ स्नान के लिए उठे। मन में आस्था और मां गंगा पर अटल विश्वास का दीपक लेकर करोड़ों लोग देश के कोने-कोने से कुंभ के लिए चल दिए। लोगों को राह मिलती गई और हौसला बढ़ता गया।

कुंभ में 45-50 करोड़ तक की भीड़ आने के अनुमान ही नहीं लगाए गए बल्कि पूरे भरोसे से यह बात बार-बार दोहराई भी गई। देशभर से स्पेशल ट्रेनों का रेला लगा दिया गया। प्रदेश भर से मेला बसें लगी हुई हैं। इंतजामों के सरकारी दावों, जबरदस्त पब्लिसिटी और सोशल मीडिया के आसमान छूते इस्तेमाल के चलते हर कोई इस ‘वन्स इन लाइफ टाइम’ अवसर का हिस्सा बनने के लिए आतुर हो चला है। नई परंपरा को अपनाते हुए पहली बार देशभर में राज्य सरकारों को आमंत्रण कार्ड बांटे गए, सो सब मिलजुल कर लोगों को भेजने में जुटे हुए हैं। लोग आए और आते ही गए और हादसा भी हो गया। पहले टेंट जले, सिलेंडर फटे, हालांकि किसी के हताहत न होने की शुभ सूचना सुनाई पड़ी। लेकिन बुधवार की इस भगदड़ में करीब 30 लोगों की मौत की खबर आई है। करीब 60 लोग घायल बताए गए हैं। प्रधानमंत्री व गृहमंत्री ने मृतकों के प्रति संवेदना व्यक्त की है।


जिस तरह इस कुंभ को ‘न भूतो न भविष्यत्’ करार दिया, उसके चलते अधिक लोग कुंभ पहुंचे। संगम नोज तक जाने के लिए एक रास्ता व वापसी के लिए तीन रास्ते- अक्षयवट मार्ग, महावीर मार्ग, जगदीश रैंप तय किए गए। इमरजेंसी के लिए ग्रीन कॉरिडोर भी बनाए गए हैं। पर बड़े दावों के बीच बैरिकेडिंग व गंगा के तट पर पसरी रेत पर रात गुजारने को लोग मजबूर हुए। पांटून के पुलों को बंद किया गया। जिस तरह वीआइपी सुरक्षा के इंतजाम थे, उसी तरह के इंतजाम जनता के लिए न कभी होते हैं और न इस बार थे। फिर भी सवाल बड़ा है कि जब भीड़ कंट्रोल में तनिक भी संदेह था तो क्यों इतने लोगों को संगम की तरफ बढऩे दिया गया? घाटों को लेकर सरकार ने होल्डिंग एरिया को ठीक से व्यवस्थित क्यों नहीं किया?


जो अपील दुर्घटना के बाद शुरू हुई, वो पहले से क्यों नहीं की गई कि संगम नोज जाने की जगह जो भी घाट आपके करीब है, वहीं अमृत स्नान कर लें। बाद में प्रचार किया गया कि तीन दिन में कभी भी स्नान करेंगे तो मौनी अमावस्या का फल मिलेगा। यह प्रचार पहले भी हो सकता था। इसके साथ ही श्रद्धालुओं की मनोवृत्ति भी कम जिम्मेदार नहीं है। आप जब संगम नोज पर हैं तो जल्दी किस बात की? बैरिकेड तोडक़र क्यों भागना? जब संत शाही स्नान बाद में कर सकते हैं तो लोग क्यों नहीं सब्र कर सकते? आमतौर पर ऐसे धार्मिक आयोजन में हम अपने परिवार के साथ जाते हैं। महिलाएं व बच्चे भीड़ का अनुभव नहीं रखते हैं। नतीजतन, वे किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में मनोवैज्ञानिक रूप से हतोत्साहित, उदास व चिंतित हो उठते हैं। भीड़ में प्रबल आवेग होता है। सभी लोगों का आवेग एक साथ काम कर रहा होता है। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जाती है, लोग भीड़ में खो जाते हैं। अपने बारे में नहीं सोचते हैं। यही कारण है कि अनैच्छिक रूप से व्यक्ति भीड़ के अनुरूप काम करता है। भीड़ में बुद्धि, विवेक, विचार काम नहीं करता। केवल आवेग का उफान दिखता है।


सवाल सरकार व श्रद्धालुओं दोनों से बहुत हैं। जिम्मेदार दोनों हैं। लेकिन जवाब कोई नहीं है क्योंकि जवाब होते तो किसी भी भीड़ वाली जगह पर हादसे न होते, हम पुराने हादसों से कुछ नहीं सीखते। मौनी अमावस्या पर जो हुआ उससे बहुत ही गंभीर सवाल उठ खड़े होते हैं। यह कह कर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता कि जब करोड़ों लोग जुटेंगे तो भगदड़ तो मचेगी ही। एक भी इंसान की मौत मेला के पूरे इंतजामी सिस्टम को चुनौती देता है। हादसे के शिकार लोग तो सरकारी इंतजामों पर भरोसा करके यहां आए थे। भगदड़ आगे भी नहीं होगी इसकी क्या गारंटी है? क्या कोई सिर्फ शोक संवेदना से भी आगे सोचेगा? क्या हमारा तंत्र जिंदगी का मोल कभी समझ पाएगा? दूसरी ओर, इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है, लेकिन सबको समझने की जरूरत है कि यह समय राजनीति का नहीं बल्कि ऐसी दुर्घटनाओं से सबक लेने का है।