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एम्स की रिपोर्ट में खुलासा: मोबाइल एडिक्शन से हिंसक हो रहे बच्चे, लेकिन थैरेपी और पारिवारिक सपोर्ट से लौट रही है मुस्कान

Mobile Addiction: मोबाइल एडिक्शन के बाद हिंसक हुए बच्चे अब इलाज के बाद ठीक हो रहे हैं। ऐसे बच्चों की संख्या अच्छी खासी है। एम्स के मनोरोग विभाग में 5 से 6 सेशन थैरेपी के बाद ऐसे बच्चों में काफी बदलाव आ रहा है।

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मोबाइल एडिक्शन से हिंसक हो रहे बच्चे ( फोटो सोर्स-- Shutterstock)

मोबाइल एडिक्शन से हिंसक हो रहे बच्चे ( फोटो सोर्स-- Shutterstock)

Mobile Addiction: मोबाइल एडिक्शन के बाद हिंसक हुए बच्चे अब इलाज के बाद ठीक हो रहे हैं। ऐसे बच्चों की संख्या अच्छी खासी है। एम्स के मनोरोग विभाग में 5 से 6 सेशन थैरेपी के बाद ऐसे बच्चों में काफी बदलाव आ रहा है। इससे पैरेंट्स को भी बड़ी राहत मिली है। यही नहीं स्कूलों में सहपाठी व टीचर को भी सुकून मिला है। एम्स के मनोरोग की ओपीडी में प्रतिदिन 100 मरीजों का इलाज किया जाता है, जिसमें 8 से 10 बच्चे मोबाइल एडिक्शन, एंजाइटी, ऑटिज्म के होते हैं। बच्चे मोबाइल एडिक्शन के बाद सहपाठी से मारपीट पर भी उतारू हो जाते थे। यहां तक गाली-गलौज भी करते थे।

दवा व पैरेंट्स के सपोर्टिव व्यवहार से ऐसे बच्चे सामान्य होकर पढ़ाई भी करने लगे हैं। पत्रिका ने मनोरोग विशेषज्ञ से बात की तो पता चला कि ऐसे बच्चों के इलाज के लिए केवल दवा ही काफी नहीं है, इसमें पैरेंट्स व पारिवारिक सदस्यों की भी बड़ी भूमिका होती है।

दवा तो मरीज को शांत रखेगा, लेकिन परिवार के लोगों का सपोर्टिव व्यवहार बालक को ठीक करने में मदद करेगा। इसलिए ये कहना कि इलाज के लिए दवा ही सब कुछ है, सही नहीं है। इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स ने कोरोनाकाल के पहले बच्चों के लिए एक गाइडलाइन जारी की थी कि किस उम्र के बच्चों को कितने समय तक मोबाइल फोन देना चाहिए।

Mobile Addiction: स्कूल बदलने पर भी बदल रहा व्यवहार

मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार ये ट्रेंड देखने में आता है कि स्कूल बदलने के बाद भी बच्चों का व्यवहार बदल जाता है। दरअसल होता ये है कि प्राइमरी क्लास के बच्चे छोटे होते हैं तो उन्हें समय-समय पर मोबाइल दिया जाता है। मिडिल स्कूल में पहुंच जाता है तो उन्हें ज्यादा समय के लिए मोबाइल फोन दिया जाता है। वहीं हाईस्कूल व हायर सेकंडरी के छात्र के पास स्वतंत्र रूप से मोबाइल होता है।

स्वाभाविक है, इससे छात्र ज्यादा समय मोबाइल पर बिताएगा। यही नहीं मोबाइल देखने के लिए कोई सेंसर भी नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार हिंसक व पोर्न कंटेट सबसे ज्यादा किशोरों को प्रभावित कर रहा है। ऐसे काफी केस ओपीडी में आ रहे हैं।

इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स के सुझाव

  • 2 साल से छोटे बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें।
  • 2 से 5 साल के बच्चों को केवल एक घंटे मोबाइल दें।
  • 5 से 10 साल के बच्चों को केवल दो घंटे मोबाइल दें।
  • किशोर शिक्षा, खेल, नींद, परिवार के साथ संतुलन बनाकर बनाएं
  • माता-पिता और शिक्षक बच्चों के मार्गदर्शक और रोल मॉडल बनें।

केस-1. 12 वर्षीय बालक मोबाइल एडिक्शन का शिकार था। गेम देख-देखकर वह इतना हिंसक हो गया था कि किसी के टोकने पर मोबाइल व टीवी तोड़ देता था। परेशान पैरेंट्स बच्चे को एम्स के मनोरोग विभाग में इलाज कराने गए। 5 से 6 सेशन में थैरेपी के बाद बालक का व्यवहार सामान्य हो गया है। परिवार में सब खुश हैं।

केस-2. 15 वर्षीय बालक के स्कूल बदलने के बाद अचानक व्यवहार बदल गया। पैरेंट्स समझ नहीं पाए कि ऐसा क्यों हो रहा है। दरअसल बालक अपने मोबाइल में उलझ गया था। वह एंजाइटी का शिकार हो गया था। घर में हिंसक व्यवहार करने लगा। गाली-गलौज भी करता। इलाज के बाद ठीक है।

मोबाइल एडिक्शन का शिकार ज्यादातर स्कूली बच्चे हैं। कॉलेज के छात्र भी शामिल है, इससे बच्चों का व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। वे हिंसक के अलावा जिद्दी भी हो जाते हैं। उनके इलाज में केवल दवा का रोल नहीं है, बल्कि पैरेंट्स के साथ फैमिली मेंबर की सपोर्टिव भूमिका बड़े मायने रखती है। इसलिए ऐसे बच्चों के साथ सख्ती के बजाय प्रेम से पेश आएं। कोई समस्या हो तो विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाएं। - डॉ. लोकेश सिंह, एचओडी मनोरोग एम्स