
राजधानी के दो युवा बने एनालॉग एस्ट्रोनॉट (Photo Source- Patrika)
@गुंजन परमार/Lunar Analog Mission: अंतरिक्ष में जाना जितना रोमांचक लगता है, वहां लंबे समय तक रहना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। राजधानी के दो युवाओं ने पोलैंड में चांद जैसे माहौल में 14 दिन बिताकर व्योमसेतु-1 लूनर एनालॉग अंतरिक्ष मिशन की मुश्किलों को करीब से महसूस किया। लुमेश साहू और अर्शलीन कौर साहनी सात सदस्यीय भारतीय टीम का हिस्सा रहे, जिसने पोलैंड के एनालॉग स्पेस मिशन में लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने जैसी परिस्थितियों का अभ्यास किया। इस दौरान न मोबाइल था, न इंटरनेट और न ही अपनी मर्जी से दिनचर्या तय करने की आजादी।
सीमित खाना-पानी और ऑक्सीजन के बीच टीम ने करीब 16 घंटे रोज मिशन से जुड़े काम किए। हर तीन घंटे में ब्लड प्रेशर, ऑक्सीजन और दूसरे जरूरी शारीरिक मानकों की जांच हुई। चांद जैसी सतह पर स्पेस सूट पहनकर बाहर निकलने से लेकर सोलर पैनल खराब होने, बैटरी बदलने और कम्युनिकेशन फेल होने जैसी इमरजेंसी का भी अभ्यास किया गया। इस मिशन का मकसद भविष्य के वास्तविक अंतरिक्ष अभियानों के लिए इंसान, तकनीक और टीमवर्क की तैयारी को समझना था।
एआरकासा के ‘व्योमसेतु-1’ लूनर एनालॉग मिशन में सीमित संसाधनों के बीच स्लीप, प्लांट ग्रोथ और इमरजेंसी रिस्पॉन्स पर किया अभ्यास
पोलैंड में हुए इस मिशन में सातों सदस्य अलग-अलग तकनीकी क्षेत्रों से थे। कोई बायोटेक्नोलॉजी से जुड़ा था तो कोई स्पेस आर्किटेक्चर, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, एआई और इलेक्ट्रॉनिक्स से। यहां बाहर की दुनिया से सामान्य संपर्क पूरी तरह बंद था। सिर्फ मिशन कंट्रोल से जरूरत के मुताबिक बातचीत होती थी। सभी सदस्यों का रूटीन तय था और उन्हें करीब 16 घंटे तक अलग-अलग काम करने होते थे। किसी की जिम्मेदारी फोटोग्राफी और डॉक्यूमेंटेशन की थी तो कोई सफाई, डिजाइन या प्रयोगों से जुड़ा काम करता था। टीम को रोज करीब 1500 कैलोरी खाना दिया जाता था। अर्शलीन ने क्रू कमांडर की भूमिका निभाई और लुमेश ने कम्युनिकेशन ऑफिसर रहे।
टीम ने स्पेस सूट पहनकर चांद की सतह जैसी जगह पर ईवीए यानी एक्स्ट्रा व्हीकुलर एक्टिविटी की। रेडियो कम्युनिकेशन में परेशानी आने पर वैकल्पिक तरीके से संदेश भेजने का अभ्यास भी किया। अगर बाहर काम करते समय सोलर पैनल खराब हो जाए, बैटरी बदलनी पड़े या कोई इमरजेंसी आ जाए तो क्या करना है, इसका भी अभ्यास कराया गया।
टीम ने छोटे पौधों यानी माइक्रोग्रीन्स के बीजों को माइक्रोग्रैविटी जैसी परिस्थितियों में उगाने से जुड़े प्रयोग किए। बायोटेक्नोलॉजी से जुड़े लुमेश के अनुसार, अंतरिक्ष में सिर्फ इंसानों के शरीर में ही बदलाव नहीं होते, बल्कि पौधों और माइक्रोऑर्गेनिज्म में भी कई तरह के बदलाव आ सकते हैं। ऐसे प्रयोग भविष्य के लंबे अंतरिक्ष अभियानों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
व्योमसेतु-1 भारत का एक एनालॉग अंतरिक्ष मिशन है, जिसमें धरती पर चांद जैसी परिस्थितियां बनाकर अंतरिक्ष यात्रियों की तैयारियों का अभ्यास किया गया। पोलैंड में हुए इस 27 दिवसीय अभियान में भारतीय क्रू ने सीमित जगह, संसाधनों और एकांत में रहकर स्लीप, प्लांट ग्रोथ, टीमवर्क, कम्युनिकेशन और इमरजेंसी परिस्थितियों पर काम किया।
Updated on:
4 Sep 2026, 11:32 AM IST
Published on:
4 Sep 2026, 11:32 AM IST
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