
मां की अर्थी को 4 बेटियों ने दिया कंधा (पत्रिका फोटो)
नाथद्वारा (राजसमंद): जीवनभर अपने परिवार को उच्च संस्कारों की सीख देने वाली शतायु रुक्मणी देवी त्रिपाठी के निधन के बाद उनकी अंतिम यात्रा एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक संदेश छोड़ गई। शहर के 'नानीजी का बाग' निवासी स्वर्गीय मोहनलाल त्रिपाठी की धर्मपत्नी रुक्मणी देवी के देवलोकगमन के पश्चात्, उनकी चारों पुत्रियों ने मां की अर्थी को कंधा देकर यह सिद्ध कर दिखाया कि अंतिम विदाई का दायित्व केवल पुत्रों तक सीमित नहीं है। बेटियां भी हर सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह सक्षम हैं।
मां को अंतिम विदाई देते समय सुशीला देवी, मंजू देवी, मधुबाला और विजयलक्ष्मी की आंखें नम थीं, लेकिन उनके चेहरों पर अपनी मां के प्रति अटूट निष्ठा और अपार श्रद्धा थी। परंपरा से परे जाकर उन्होंने पूरे साहस और आत्मीयता के साथ अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया। अंतिम यात्रा में उपस्थित समाजजनों ने जब इस दृश्य को देखा, तो हर कोई भावविभोर हो उठा और बेटियों के इस साहसिक कदम की मुक्तकंठ से सराहना की। दिवंगत रुक्मणी देवी के पौत्र विनय त्रिपाठी ने श्मशान घाट पर सनातन विधि-विधान के साथ चिता को मुखाग्नि दी।
इस अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार में परिवारजनों के साथ-साथ बड़ी संख्या में समाज के प्रबुद्ध नागरिक शामिल हुए। अंतिम संस्कार के दौरान नितिन त्रिपाठी, रमेशचंद्र त्रिपाठी, समाज अध्यक्ष राधारमण गौतम, संरक्षक पीयूष त्रिपाठी, महामंत्री मुकेश त्रिपाठी सहित पुत्रवधू श्यामा, पौत्रवधू सुनीता व रुचिका, पौत्री मीनू, इंदुबाला व नेहा, तथा प्रपौत्री हंसिका, अवनी, दीप्ति और याशिका उपस्थित थीं।
अंतिम यात्रा के दौरान जब चारों बहनों ने एकजुट होकर अपनी मां की अर्थी को उठाया, तो वहां मौजूद लोगों की आंखें छलक आईं। यह मार्मिक और भावुक दृश्य देखकर अनेक लोग अपने आंसू रोक न सके। समाज के वरिष्ठजनों, रिश्तेदारों और परिचितों ने बेटियों के पास जाकर उन्हें संभाला, ढांढस बंधाया और उनके इस अनुकरणीय साहस की प्रशंसा की। वहां उपस्थित प्रबुद्ध जनों का कहना था कि बेटियों ने जिस आत्मीयता और श्रद्धा के साथ अपनी मां को अंतिम विदाई दी है, वह बदलते समाज की एक अत्यंत सकारात्मक सोच का प्रतीक है।
बदलते सामाजिक परिवेश में बेटियों द्वारा निभाई गई यह जिम्मेदारी न केवल मातृभक्ति और पारिवारिक संस्कारों का जीवंत उदाहरण बनी, बल्कि इसने समाज को यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि बेटा और बेटी दोनों समान हैं। रूढ़िवादी मान्यताओं को पीछे छोड़ते हुए बेटियों ने यह साबित कर दिया कि हर कठिन और पवित्र दायित्व को निभाने में वे किसी से पीछे नहीं हैं। नाथद्वारा की यह अंतिम यात्रा केवल शोक व्यक्त करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक बदलाव, समरसता और समानता की एक सशक्त मिसाल बन गई।
Updated on:
27 Jul 2026, 9:36 PM IST
Published on:
27 Jul 2026, 9:36 PM IST
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