
निकाय चुनाव परिणाम आने के बाद मतगणना स्थल के बाहर नारे लगाते विजेताओं के समर्थक (पत्रिका फोटो)
Rajsamand Nikay Chunav Result: नगर निकाय चुनाव के अंतिम नतीजों ने राजसमंद जिले की सियासत का नया गणित सामने रख दिया है। पांच नगर निकायों के 155 वार्डों के परिणामों में कांग्रेस ने 74 वार्ड जीतकर भाजपा पर चार सीटों की बढ़त बनाई है। भाजपा को 70 वार्डों में जीत मिली, जबकि 11 वार्डों में निर्दलीयों ने बाजी मारकर दोनों प्रमुख दलों के सामने अपनी ताकत का अहसास कराया है।
कुल आंकड़ों में भले ही कांग्रेस चार कदम आगे निकल गई हो, लेकिन निकायवार नतीजे तस्वीर को और दिलचस्प बना देते हैं। राजसमंद और आमेट में भाजपा का दबदबा, भीम और देवगढ़ में कांग्रेस की मजबूत पकड़ और नाथद्वारा में कांटे की टक्कर ने जिले की राजनीति को एक ही रंग में रंगने के बजाय पांच अलग-अलग तस्वीरों में बांट दिया है।
सबसे खास बात यह है कि जिले के कुल 155 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर महज चार सीटों का है। यानी दोनों दलों के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा। ऐसे में 11 निर्दलीय पार्षद आने वाले सियासी समीकरणों में खास भूमिका निभा सकते हैं। खासकर उन निकायों में, जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच बहुमत का अंतर कम है, निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
जिले की सबसे बड़ी नगर परिषद राजसमंद के 45 वार्डों में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 27 वार्डों पर कब्जा जमाया। कांग्रेस को 14 वार्ड मिले, जबकि चार वार्डों में निर्दलीय विजयी रहे। राजसमंद के नतीजों को भाजपा के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।
यहां विधायक दीप्ति माहेश्वरी और भाजपा जिलाध्यक्ष जगदीश पालीवाल की रणनीति के बल पर पार्टी ने पिछली बार के मुकाबले अपनी स्थिति मजबूत की। पिछले कार्यकाल में सभापति की कुर्सी कांग्रेस के पास थी, लेकिन इस बार भाजपा ने उस पर कब्जा जमा लिया। यानी सिर्फ पार्षदों की संख्या ही नहीं बढ़ी, बल्कि निकाय की सत्ता भी कांग्रेस से भाजपा के हाथ में चली गई।
राजसमंद नगर परिषद के परिणामों में सबसे बड़ा सियासी उलटफेर सीटों के आंकड़ों में दिखाई देता है। वर्ष 2021 में भाजपा के 17 पार्षद जीतकर आए थे, जो इस बार बढ़कर 27 हो गए। यानी भाजपा को 10 सीटों का फायदा हुआ। इसके उलट कांग्रेस को पिछली बार 26 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार वह 14 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को सीधे तौर पर 12 वार्डों का नुकसान उठाना पड़ा।
इसके पीछे कांग्रेस नेताओं द्वारा वार्डवार पर्याप्त रुचि नहीं दिखाने की बात सामने आ रही है। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने डोर-टू-डोर संपर्क के जरिए मतदाताओं को साधने की कोशिश की। कांग्रेस अपने मतों के ध्रुवीकरण को रोक नहीं पाई, जिसका असर परिणामों में साफ दिखाई दिया।
निर्दलीयों ने भी इस बार अपनी मौजूदगी बढ़ाई। वर्ष 2021 में जहां एक निर्दलीय प्रत्याशी जीता था, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़कर चार हो गई। इससे साफ है कि स्थानीय स्तर पर कई वार्डों में मतदाताओं ने प्रमुख दलों के अलावा निर्दलीय उम्मीदवारों को भी विकल्प के रूप में चुना।
भीम नगरपालिका में पहली बार चुनाव हुए और पहली ही परीक्षा में कांग्रेस ने अपना कब्जा जमा लिया। यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे। भाजपा का एक प्रत्याशी पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो गया था, जबकि बैलेट से भाजपा को केवल एक सीट मिल सकी।
भीम में कांग्रेस की कमान पूर्व विधायक सुदर्शन सिंह रावत के नेतृत्व में रही। वहीं, भाजपा के नुकसान के पीछे विधायक हरिसिंह रावत के बड़े बोल को एक कारण माना जा रहा है। चुनाव के दौरान मतों का तेजी से ध्रुवीकरण हुआ और उसका सीधा असर भाजपा के प्रदर्शन पर पड़ा।
भीम का परिणाम भाजपा के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि पहली बार हुए नगरपालिका चुनाव में पार्टी अपनी मजबूत राजनीतिक मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकी। कांग्रेस ने यहां संगठनात्मक स्तर पर बेहतर तालमेल के साथ चुनाव लड़ा और उसका असर नतीजों में दिखाई दिया।
आमेट में भाजपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए अपनी बढ़त बनाई। यहां चुनाव की कमान पूर्व मंत्री एवं कुंभलगढ़ विधायक सुरेंद्र सिंह राठौड़ ने संभाल रखी थी। आमेट का परिणाम भाजपा के लिए यह संकेत लेकर आया कि संगठन और नेतृत्व की रणनीति का असर स्थानीय निकाय के चुनावी मैदान में दिखाई दे सकता है।
भाजपा ने चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर संगठन को सक्रिय रखा और मतदाताओं के बीच पहुंच बनाने पर जोर दिया। इसका फायदा पार्टी को मिला और आमेट में वह कांग्रेस से आगे निकलने में सफल रही।
नाथद्वारा में तस्वीर सबसे ज्यादा दिलचस्प रही। यहां कांग्रेस की ओर से डॉ. सीपी जोशी ने कमान संभाली, जबकि भाजपा की तरफ से विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ और सांसद महिमा कुमारी ने पूरी ताकत झोंक दी। दोनों दलों के बीच मुकाबला कांटे का रहा।
नतीजा ऐसा आया कि अब दोनों ही दलों की नैया निर्दलीयों के सहारे पार लगती नजर आ रही है। यही कारण है कि नाथद्वारा का चुनाव परिणाम केवल जीत-हार का आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले निकाय के राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गया है।
निर्दलीय पार्षदों की भूमिका यहां बोर्ड गठन में निर्णायक हो सकती है। दोनों प्रमुख दलों को अपने पक्ष में बहुमत जुटाने के लिए निर्दलीय पार्षदों से संपर्क साधना पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में नाथद्वारा की स्थानीय राजनीति में सियासी गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
देवगढ़ में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपनी स्थिति मजबूत की। यहां पार्टी ने कई वार्डों में भाजपा को पीछे छोड़कर अपनी राजनीतिक पकड़ का संकेत दिया। जिले के अन्य निकायों के मुकाबले देवगढ़ का परिणाम कांग्रेस के लिए राहत देने वाला रहा।
राजसमंद जिले के पांचों निकायों के नतीजे एक साथ देखने पर साफ होता है कि किसी एक दल का पूरे जिले में दबदबा नहीं रहा। अलग-अलग निकायों में स्थानीय नेतृत्व, प्रत्याशियों की पकड़ और वार्ड स्तर की रणनीति ने परिणामों को प्रभावित किया।
जिले की पांचों नगर निकायों के आंकड़ों को एक साथ देखें तो तस्वीर कांग्रेस के पक्ष में जाती है। 155 वार्डों में कांग्रेस के 74 पार्षद, भाजपा के 70 पार्षद और 11 निर्दलीय विजयी रहे। लेकिन निकायवार परिणामों ने दोनों दलों की अलग-अलग ताकत भी सामने रख दी।
राजसमंद और आमेट में भाजपा ने अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई, जबकि भीम और देवगढ़ में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा। नाथद्वारा में दोनों दलों के बीच कड़ी टक्कर रही। इस तरह जिले की सियासत में कोई एक दल पूरी तरह हावी नहीं हो पाया।
राजकीय पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में सुबह आठ बजे मतगणना शुरू हुई। जैसे-जैसे रुझान सामने आते गए, मतगणना स्थल के बाहर समर्थकों का उत्साह बढ़ता गया। जीत की खबर मिलते ही समर्थकों ने नारेबाजी शुरू कर दी। अंतिम परिणाम तक बड़ी संख्या में लोग मतगणना स्थल के बाहर डटे रहे। जीत की खुशी में पटाखे छोड़े गए और समर्थकों ने जमकर नारे लगाए। मतगणना स्थल पर सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे। पुलिस और प्रशासन की टीमों ने मतगणना के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगातार निगरानी की।
नगर निकाय चुनाव के अंतिम परिणामों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि राजसमंद जिले में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी है। कुल आंकड़ों में कांग्रेस का 74 का आंकड़ा भाजपा के 70 से आगे है, लेकिन महज चार वार्डों का अंतर दोनों दलों के बीच कड़ी टक्कर को दर्शाता है।
वहीं, 11 निर्दलीय पार्षदों की जीत ने यह भी संकेत दिया है कि कई वार्डों में मतदाताओं ने भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग विकल्प को भी तरजीह दी। यही निर्दलीय आने वाले दिनों में कई निकायों के राजनीतिक समीकरण तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
राजसमंद जिले के निकाय चुनाव ने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय राजनीति में सिर्फ पार्टी का नाम ही निर्णायक नहीं होता। प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे, संगठन की सक्रियता और नेताओं की रणनीति भी चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालती है।
कहीं भाजपा का कमल खिला तो कहीं कांग्रेस का पंजा मजबूत रहा और कई वार्डों में निर्दलीयों ने दोनों दलों की चुनावी रणनीति को चुनौती दे दी। ऐसे में राजसमंद जिले की निकाय राजनीति फिलहाल किसी एक दल के लिए खुला मैदान नहीं है। कांग्रेस भले ही कुल सीटों में चार वार्ड की बढ़त के साथ आगे रही हो, लेकिन भाजपा ने भी कई महत्वपूर्ण निकायों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि बोर्ड गठन के दौरान निर्दलीय पार्षद किसके साथ जाते हैं और स्थानीय निकायों की सत्ता का अंतिम गणित किसके पक्ष में बैठता है।
| दल | 2021 | 2026 | स्थिति |
| भाजपा | 17 | 27 | 10 सीटों का फायदा |
| कांग्रेस | 26 | 14 | 12 सीटों का नुकसान |
| निर्दलीय | 01 | 04 | 3 सीटों का फायदा |
| क्षेत्र / निकाय | कुल सीट | भाजपा | कांग्रेस | अन्य |
|---|---|---|---|---|
| राजसमंद | 45 | 27 | 14 | 04 |
| नाथद्वारा | 40 | 20 | 19 | 01 |
| देवगढ़ | 25 | 07 | 16 | 02 |
| आमेट | 25 | 14 | 11 | 00 |
| भीम | 20 | 02 | 14 | 04 |
Updated on:
15 Sept 2026 03:31 pm
Published on:
15 Sept 2026 03:31 pm
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