
अखंड ज्ञान आश्रम में संत विशोकानंद भारती ने श्रीराम कथा के माध्यम से भक्ति, गुरु-शक्ति और संन्यास के मर्म को बताते हुए कहा मन, वचन और कर्म एक दिशा में आएं तो साधना का मार्ग खुलता है
रतलाम. संन्यास केवल वस्त्र बदलने का नाम नहीं है। सम्यक प्रकार के न्यास को ही संन्यास कहा गया है। आश्रम, गृहस्थ और संन्यास आश्रम के संबंध में भी साधकों को चिंतन करना चाहिए। जब बुद्धि शुद्ध हो जाए और भीतर से वैराग्य जागृत हो, तभी संन्यास के मार्ग पर आगे बढऩा चाहिए।
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत मंगलवार को संत विशोकानंद भारती के सानिध्य में प्रात:काल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। उन्होंने कहा कि राम ब्रह्म हैं तो माता कौशल्या समाधि के स्वरूप को धारण करती हैं।
श्रीराम के पूर्ण स्वरूप को समझना आवश्यक
संत विशोकानंद भारती ने श्रीराम के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि श्रीराम पूर्ण हैं और राम को केवल द्वैत के दृष्टिकोण से समझना पर्याप्त नहीं है। द्वैत और अद्वैत के बीच होने वाले वाद-विवाद से ऊपर उठकर राम के पूर्ण स्वरूप को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि महान संत करपात्री ने भगवान श्रीराम के संबंध में जिस गहराई से चिंतन प्रस्तुत किया, वह अद्वितीय है। उन्होंने तुलसीदास की रामकथा में माता सीता के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि सीता स्वयं समर्थ शक्ति हैं।
आज निकलेगी कलश यात्रा, देवी भागवत पुराण होगी शुरू
अखंड ज्ञान आश्रम के संत देव स्वरूपानंद ने बताया कि 16 सितंबर को देवी भागवत पुराण की शुरुआत की जाएगी। इसके पूर्व प्रात: 9 बजे कलश यात्रा के लिए श्रद्धालु अखंड ज्ञान आश्रम में एकत्रित होंगे। कलश यात्रा काटजू नगर स्थित शिव मंदिर से शुरू होकर अखंड ज्ञान आश्रम पहुंचेगी। आश्रम में कलश यात्रा के समापन के बाद पोथी पूजन किया जाएगा और इसके साथ ही श्रीदेवी भागवत पुराण कथा श्रवण कराई जाएगी।
भक्त के दृढ़ निश्चय के वशीभूत है भगवान
उन्होंने साधकों से कहा कि गुरु के पास जाने पर केवल सामान्य चर्चा न करें, बल्कि यह पूछें कि आज की तारीख में मुझे क्या करना है? साधना के लिए मिलने वाले समय और अवसर का सदुपयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि साधक की संगति और वातावरण साधना के अनुकूल नहीं है तो उसके आध्यात्मिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है। प्रवचन के दौरान भगवान श्रीराम और भक्त हनुमान से जुड़ी संजीवनी प्रसंग की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति में दृढ़ निश्चय का विशेष महत्व है। भगवान स्वयं कहते हैं कि यदि मेरे भक्त का निश्चय दृढ़ है तो मैं उसके वशीभूत हो जाता हूं। भरत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भरत नंदीग्राम में संन्यासी के समान जीवन व्यतीत कर रहे थे। हनुमान जी के संकट के समय भरत की पुकार और उनकी साधना की शक्ति का वर्णन करते हुए उन्होंने भक्ति की दृढ़ता को समझाया।
शिष्य की साधना से श्रेष्ठ गुरु की प्राप्ति
उन्होंने साधकों को संबोधित करते हुए कहा कि मन, वचन और क्रिया जब एक ही दिशा में आ जाते हैं, तभी साधना का वास्तविक पॉइंट खुलता है। उन्होंने कहा कि सत्संग और साधक के बीच यदि माया की दीवार खड़ी हो जाए तो साधना प्रभावित होती है। मनुष्य को अपने कर्म, वचन और आचरण से गुरु के मार्ग पर चलना चाहिए। स्वामी ने कहा कि हमारी भक्ति, गुरु की शक्ति साधना का आधार है। उन्होंने भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्त्व को बताते हुए कहा कि शिष्य की साधना से उसे श्रेष्ठ गुरु की प्राप्ति होती है और साधक की साधना से ही भगवान की महिमा प्रकट होती है।
साधना के मार्ग पर आगे बढऩे का संदेश
उन्होंने संन्यास की इच्छा रखने वाले साधकों को सावधान करते हुए कहा कि संन्यास किसी दिखावे या केवल गृहस्थ जीवन से बचने का माध्यम नहीं है। जब बुद्धि शुद्ध हो जाए और भीतर से वास्तविक वैराग्य उत्पन्न हो, तभी संन्यास ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने साधकों को सांसारिक मोह-माया में उलझने के बजाय आत्मचिंतन और साधना के मार्ग पर आगे बढऩे का संदेश दिया। कथा के बाद आरती हुई। प्रसादी का सहयोग ललिता देवी एवं राजेंद्र पुरोहित जवाहर नगर की ओर से किया गया। आयोजन में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु एवं भक्तजन उपस्थित रहे।
Updated on:
15 Sept 2026 10:05 pm
Published on:
15 Sept 2026 10:01 pm
