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Govind Devji Jaipur : जयपुर के मंदिरों में फूल बंगला की एडवांस बुकिंग, मोगरा-केवड़े से सजेंगे ठाकुरजी

Jaipur Phool Bangla Jalvihar Booking : जयपुर के मंदिरों में गर्मी के बीच फूल बंगला और जलविहार झांकियों की एडवांस बुकिंग तेज हो गई है। जानिए ठाकुरजी को शीतलता पहुंचाने की सदियों पुरानी परंपरा, युवाओं में बढ़ते क्रेज और खास शीतल भोग का महत्व।

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Jaipur Flower Bungalow & Jalvihar Tradition

Jaipur Flower Bungalow & Jalvihar Tradition : जयपुर में फूल बंगला और जलविहार का क्रेज, गर्मी में ठाकुरजी को ठंडक पहुंचाने की अनोखी परंपरा (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Govind Devji Phool Bangla Booking : जयपुर की भीषण गर्मी के बीच मंदिरों में ठाकुरजी को शीतलता पहुंचाने की सदियों पुरानी परंपरा फिर चर्चा में है। शहर के प्रमुख मंदिरों में ‘फूल बंगला’ और जलविहार झांकियों के लिए जून तक एडवांस बुकिंग हो चुकी है। मोगरा, केवड़ा और गुलाब से सजाए जाने वाले ये दिव्य महल सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि भक्तों की गहरी आस्था का प्रतीक हैं। खास बात यह है कि सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम रील्स के कारण अब युवा भी इस परंपरा से तेजी से जुड़ रहे हैं।

जून महीने के लिए एडवांस बुकिंग

जैसे ही सूरज देवता अपने तीखे तेवर दिखाना शुरू करते हैं, वैसे ही गुलाबी नगरी जयपुर का मिजाज पूरी तरह बदल जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस बार शहर की भीषण गर्मी ने सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि भगवान के प्रति भक्तों के लाड़-प्यार को भी एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है? जी हां, जब पारा आसमान छूने लगता है, तो जयपुर की सदियों पुरानी 'ठाकुरजी को शीतलता' पहुंचाने की परंपरा अपने चरम पर आ जाती है।

यही वजह है कि शहर के प्रमुख देवस्थानों में अभी से जून के महीने तक के लिए 'फूल बंगला' और जलविहार झांकियों की ताबड़तोड़ एडवांस बुकिंग हो चुकी है। भक्त अपने आराध्य को चिलचिलाती धूप से बचाने के लिए पलक-पावड़े बिछाए बैठे हैं।

फूल बंगला सिर्फ सजावट नहीं, भक्तों की भावना है

मोतीडूंगरी गणेश मंदिर के महंत कैलाश शर्मा का कहना है कि लोग इसे महज एक डेकोरेशन समझने की भूल न करें। यह असल में भगवान को ठंडक का अहसास कराने की एक बेहद भावुक और पवित्र सेवा है। इसे बनाने के लिए बांस और लकड़ी की विशेष खपच्चियों (जिन्हें स्थानीय भाषा में 'टाटी' कहा जाता है) का ढांचा तैयार किया जाता है। फिर उस पर फूलों की मदद से शानदार दरवाजे, राजसी झरोखे, छज्जे और खिड़कियां उकेरी जाती हैं, जिससे यह सचमुच का एक 'फूल महल' नजर आने लगता है।

फूल बंगला में मोगरा-केवड़े की खुशबू से महकेंगे मंदिर

इस खास सेवा के लिए हर फूल का चयन नहीं किया जा सकता। इसके लिए मुख्य रूप से मोगरा, केवड़ा, रजनीगंधा, देसी गुलाब और विदेशी ऑर्किड के साथ रंग-बिरंगी पत्तियों का इस्तेमाल होता है। इन फूलों की खासियत यह होती है कि इनकी भीनी-भीनी खुशबू और प्राकृतिक ठंडक पूरे 24 घंटे तक बनी रहती है। एक मीडियम साइज का फूल बंगला तैयार करने में करीब 15 से 40 किलो तक ताजे फूलों की जरूरत पड़ती है।

आंकड़ों की नजर से: जयपुर की अनूठी भक्ति

20 से ज्यादा: राजधानी के प्रमुख मंदिर जहां हर साल यह सेवा बड़े पैमाने पर आयोजित होती है।

10 फूल बंगले: इस बार 'अधिक मास' के विशेष दिनों के लिए पहले ही बुक किए जा चुके हैं।

15 से अधिक: जलविहार की विशेष झांकियां, जहां भगवान फव्वारों और शीतल जल के बीच दर्शन देते हैं।

सालाना कैलेंडर: मोतीडूंगरी जैसे मंदिरों में साल भर में 52 बुधवार, 12 पुष्य नक्षत्र और 16 चौथ (चतुर्थी) के खास मौकों पर विशेष बंगले सजाने का विधान है।

जयपुर के इन मंदिरों में फूल बंगला बुकिंग फुल

राधा दामोदर मंदिर के महंत मलय गोस्वामी बताते हैं कि इस बार भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। गोविंद देवजी, गोपीनाथजी, इस्कॉन मंदिर और चौड़ा रास्ता स्थित राधा दामोदर जी सहित तमाम प्रमुख वैष्णव और गणेश मंदिरों में आने वाले हफ्तों के लिए शनिवार और रविवार की तारीखें पहले ही लॉक हो चुकी हैं।

परंपरा का इतिहास और आधुनिक क्रेज

1. क्या है इसका ऐतिहासिक महत्व?

    जयपुर में फूल बंगला और जलविहार की यह परंपरा रियासतकालीन है। पूर्व राजपरिवार के समय से ही गोविंद देवजी मंदिर में ऋतुओं के अनुकूल ठाकुरजी की सेवा (जैसे सर्दियों में गर्म पोशाक और गर्मियों में शीतल भोग) का नियम रहा है। जयपुर के अलावा वृंदावन और मथुरा के मंदिरों में भी ज्येष्ठ-आषाढ़ के महीने में इस तरह की झांकियां सजाई जाती हैं, जो संस्कृति की जीवंतता को दर्शाती हैं।

    2. युवाओं का बढ़ता क्रेज

      एक वक्त था जब मंदिरों की इन पारंपरिक सेवाओं में सिर्फ बुजुर्ग या परिवार के बड़े लोग ही आगे रहते थे। लेकिन आज का युवा वर्ग इस खूबसूरत संस्कृति की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहा है। मोगरे के सफेद फूलों के बीच सजी भगवान की मनमोहक तस्वीरें और इंस्टाग्राम रील्स युवाओं को मंदिरों तक खींच रही हैं। युवा अब केवल दर्शन करने नहीं आ रहे, बल्कि वे खुद इन झांकियों के प्रबंधन और बुकिंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

      3. सेहत से भी है कनैक्शन: 'शीतल भोग' की शुरुआत

        गर्मी के दिनों में केवल भगवान का पहनावा और बंगला ही नहीं बदलता, बल्कि उनके 'मेन्यू' में भी बड़ा बदलाव आता है। मंदिरों में इस दौरान आम पना, तरबूज का रस, मटके का ठंडा पानी, सत्तू, ककड़ी और मिश्री-माखन जैसे 'शीतल भोग' अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक नजरिए से माना जाता है कि भगवान को ऋतु के अनुसार चीजें अर्पित करने से परिवार में सुख, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।