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कभी बगीचे में लगता था मुगल दरबार, आप भी जानिए कैसे इतिहास बन गई आम के पेड़ों के विवाह की परंपरा

विकास के नाम पर गांवों से उजड़ रही अमराईयां, कभी पर्यावरण का अहम हिस्सा थे आम के बगीचे
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रीवा

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Mahesh Kumar Singh

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Updated: 5 Jun 2018, 12:39 PM IST

the Mughal court In the mango garden

the Mughal court In the mango garden

रीवा. विकास के नाम पर गांवों से उजाड़ी जा रही अमराईयां सचमुच में चिंता का विषय हैं। क्योंकि कभी आम के बगीचे एवं पेड़-पौध पर्यावरण का अहम हिस्सा थे। लेकिन अब काफी कम जगहों पर बगीचे देखने को मिल रहे हैं। गाँवों में लगे आम के बगीचे यदि बच्चों के लिए खेल के मैदान हैं तो गांव में आए परदेशी के लिए सुखद आवास हैं। बारात के समय आम का बगीचा जनवास है तो गर्मी की झुलसती धूप में शीतल आश्रय है आम के पेड़ की यह छाया, किन्तु एक दिन ऐसा भी आएगा जब बूढ़े होकर नष्ट हो जायेंगे ये आम के बगीचे। तब न कोयल की कूक रहेगी, न अल्हड़ अमराईयां। अम्रकुंज के स्थन पर या तो उडऩे लगेगी धूल या बन जायेंगे पक्के माकान और कहा जाने लगेगा कि अब गांवों का विकास हो रहा है।


सर टामस रो ने बगीचे में लगाया दरबार
उपलब्ध साक्ष्य के अनुसार 400 वर्ष पूर्व भी वरिष्ठ लोगों का पड़ाव (कैम्प) आम के बगीचों में ही लगते थे। सन 1615 ई. में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम का प्रथम राजदूत होकर ‘सर टामस रो’ मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में आया था। बुरहानपुर में टामस रो को अकबरी सराय में ठहराया गया जहां भीषण गर्मी थी। दूसरे दिन टामस रो ने एक सुन्दर बगीचे में शरण ली,और वहां पर अपने तम्बू गाड़ दिए। सन् 1790 ई. में अंग्रेज यात्री लेकी मध्यप्रदेश आया था। उसके यात्रा वर्णन में कहा गया है कि रीवा ग्राम में आम का एक विस्तृत बगीचा था। अंग्रेज यात्री ने रीवा ग्राम में आम के बगीचे में एक विशाल तालाब के किनारे पड़ाव डाला था। सन 1835 ई. में डब्लू.एच.स्लीमेन भी शैदपुर में एक ऊंचे स्थन पर अमराई के बीच रहा था। विदेशी यात्रियों के बगीचे में रहने की बातों से प्रतीत होता है कि आम की अमराईयों में न केवल छोटे जनों के आश्रय थे, बल्कि विदेशी राजदूतों एवं विदेशी यात्रियों तक के निवास हेतु ये बगीचे उपयुक्त स्थान थे।


विवाह उत्सव की थी परंपरा
पुराने समय में आम के पेड़ की शादी कराये जाने की परम्परा रही है। विवाह का यह आयोजन उतनी ही धूमधाम से किया जाता था जितना उत्साह किसी मानव के विवाह में प्रकट होता है। स्लीमन ने जबलपुर के समीप आम के झाड़ों के विवाह की रोचक कथा अंकित की है। हिन्दुओं में यह प्रथा है कि वे जब तक आम के वृक्षों की शादी पास के किसी पेड़ से नहीं कर देते थे तब तक झाड़ (पेड़) का मालिक या मालकिन आम का फल नहीं खाते थे। स्लीमन के अनुसार सन्1835 ई. में जबलपुर में एक ऐसी अमराई का एक मलिक बरजोर सिंह कई वर्षों तक आम का फल नहीं खा सका, क्योंकि अपने आम के झाड़ का विवाह करने के लिए उसके पास रूपए नही थे। बाद में उसने बड़ी धूमधाम से आम के पेड़ का विवाह किया और तब आम का फल चखा। एक समय वह भी था जब लोग अपने ही लगाए गए आम के बगीचे का धार्मिक रीत के अनुसार ब्रतबन्ध (उपनयन) संस्कार कराया करते थे। उसके पीछे उनकी मान्यता थी कि वृक्ष को संस्कारवान एवं परोपकारी बनाने के लिए ऐसा करना जरूरी था।


रीवा के हर गांव में हैं आम के बगीचे
रीवा जिले के प्रत्येक गांव में कम से कम दो-चार एकड़ की भूमि पर अभी भी आम का बगीचा है। 50 से लेकर 200 तक आम के वृक्षों की श्रृंखला गांव में मिल जाती है। देशी आम के वृक्ष जो फल भले ही कम देतें हों, लेकिन शीतलता एवं घनी छाया ज्यादा देते है। त्योंथर तहसील के कई गांवों में बड़े-बड़े आम के बगीचे अभी भी हैं। लेकिन अभी जहां भी आम का बगीचा है, वह पुराना हो चुका है। इस समस्या से निपटने के लिए क्या हम नए वृक्ष लगा रहे हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए नए आम के बगीचे तैयार करने होंगे। आम के वृक्ष को एक परोपकारी एवं श्रेष्ठ जीव के रूप में उसके अस्तित्व को स्वीकार किया जाता था, जो परम्परा अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है तथा नई पीढ़ी को उसके मनोवैज्ञानिक भाव को नहीं समझाया जा रहा है। मानव जीवन के उपकारी इन आम के बगीचों को यदि नही सहेजा गया तो इतिहास बन जायेंगी गांव की अमराईयां।