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तारामंडल में 11 साल से ताला, मजदूरों का बना बसेरा

स्कूल प्रबंधन की लापरवाही से नहीं हो पा रही है शुरूआत
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सागर

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Reshu Jain

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Updated: 27 Feb 2019, 10:03 AM IST

तारामंडल में  11 साल से लटका है ताला, तारे तो नहीं आए नजर अब मजदूरों का बना बसेरा

तारामंडल में 11 साल से लटका है ताला, तारे तो नहीं आए नजर अब मजदूरों का बना बसेरा

सागर. जिलेभर के बच्चों को तारामंडल, राशियों और सूर्यग्रहण व चंद्रग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं की जानकारी देने के लिए शहर के एक्सीलेंस स्कूल में तारामंडल भवन का निर्माण किया गया था। भवन को बनाने से लेकर इसमें तारामंडल शुरू करने तक करीब दस लाख रुपए भी खर्च किए गए, लेकिन स्कूल प्रबंधन की लापरवाही और अनदेखी के कारण शहर के बच्चे केवल एक साल ही इसका लाभ ले सके। अब यह तारामंडल पिछले बारह साल से ताले में बंद है। अब स्थिति यह है कि स्कूल परिसर में काम कर रहे मजदूर रह रहे हैं। तारामंडल खोला तो गया है लेकिन मजदूरों के लिए। यहां उनकी गृहस्थी का सामान जम चुका है।

छात्रों को तारामंडल में तारों की स्थिति और खगोलीय घटनाओं की जानकारी देने के लिए वर्ष 2004 में मप्र विज्ञान एवं प्रौघोगिकी परिषद(मेपकास्ट) ने जिले में तारामंडल भवन बनाने के निर्देश दिए थे। जिसके बाद वर्ष 2007 में करीब 5 लाख 75 हजार रुपए की लागत से एक्सीलेंस स्कूल परिसर में तारामंडल भवन का निर्माण किया गया। उदघाटन के बाद एक साल तक यहां विद्यार्थियों के तारामंडल की खगोलीय घटनाओं की जानकारी भी दी गई, लेकिन इसके बाद 11 सालों से ताला डला रहा। अब जब इसके दरवाजे खोले गए तो इसमें मजदूर रह रहे हैं।

प्रोजेक्टर और पोर्टेबल ड्रोम लगाए गए थे
इसमें करीब साढ़े तीन लाख रुपए से से दो प्रकार के प्रोजेक्टर और पोर्टेबल ड्रोम लगाए गए थे। पोर्टेबल ड्रोम की उंचाई कम होने और भवन की ऊंचाई ज्यादा होने से विद्यार्थियों को परेशानी आ रही थी। इसके बाद स्कूल प्रबंधन का कहना था कि फॉल सीलिंग कराकर भवन की ऊंचाई को थोड़ा कम किया जाएगा, लेकिन स्कूल प्रबंधन के द्वारा अब तक कोई कदम उठाए ही नहीं गए हैं।

रोजाना होते थे दो शो
वर्ष 2007 में बने से इस भवन में एक बार में 25 बच्चे बैठते के इंतजाम है। यहां रोजाना दो शो दिखाए जाते थे। दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के तारामंडल में बच्चों के केवल फिल्म दिखाई जाती है, लेकिन शहर के तारामंडल की खासियत यह थी कि यहां बच्चे गुब्बारे के बीच बैठकर तारामंडल का लाइव डिमोस्ट्रेशन देखते थे और साथ ही यहां मौजूद शिक्षक उन्हें सवालों के जवाब भी दिया करते थे। उस समय पूर्व कलेक्टर एचएल त्रिवेदी, जिला पंचायत अध्यक्ष हरवंश सिंह राठौर और सांसद वीनेद्र खटीक ने इसका उद्घाटन किया था।

दो शिक्षकों ने की थी सिखाने की शुरुआत
2008 में तारामंडल शुरु होने से पहले एक्सीलेंस स्कूल के दो शिक्षकों अखिलेश पाठक और रमाकांत मिश्रा को इसकी ट्रेनिंग के लिए कोलकत्ता भेजा गया था। जहां 10 दिन की ट्रेनिंग लेने बाद इन्होंने शहर में तारामंडल की शुरुआत की। ये शिक्षक स्कूल का समय खत्म होने के बाद रोजाना एक घंटा तारामंडल को दिया करते थे, लेकिन एक साल बाद भी अखिलेश पाठक का ट्रांसफर हो गया। इसके बाद जिस भी शिक्षक को तारामंडल की जिम्मेदारी सौंपी गई उन्होंने ओवर टाइम करने से मना कर दिया। वहीं इन शिक्षकों की ट्रेनिंग के लिए भी विभाग ने कोई कदम नहीं उठाया। नतीजा तारामंडल पर ताला लग गया।

भवन में चल रहा है काम
इस मामले में स्कूल प्रबंधन का कहना है कि भवन के अंदर पुट्टी और पेंट का काम चल रहा है। लेकिन वास्तव ऐसा नहीं है। पत्रिका की टीम जब मंगलवार को यहां पहुंची तो मजदूर भवन के अंदर सोते मिले और रेलिंग पर कपड़े सूख रहे थे। वहीं स्कूल के प्राचार्य आरके वैद्य का कहना है कि भवन के बाहर पेंट हो चुका था और अब अंदर पेंट किया जा रहा है।
आरके वैद्य, एक्सीलेंस स्कूल प्राचार्य

अभी भी सिखाने के लिए तैयार
अखिलेष पाठक इन दिनों भैंसा स्कूल के प्राचार्य हैं, उन्होंने बताया कि जब मैंने तारामंडल चलाया तो इसे काम की तरह नहीं लिया। पर्सनल इंट्रेस्ट था। इसलिए कभी ओवर टाइम वाली बात मन में नहीं आई। यदि अभी भी मेरी मदद की जरूरत है तो मैं शिक्षकों के लिए ट्रेंड करने तैयार हूं। तारामंडल की शुरूआत होती है तो मैं समय देने के लिए तैयार हूं।

एक्सीलेंस स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखकर तारामंडल चालू करवाया जाएगा। जो भी कमियां आ रही हैं उनकों जल्द दूर किया जाएगा।
अजब सिंह, डीइओ