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मानवरहित फाटकों पर लोगों को सतर्क करने के लिए रेलवे की मदद करेगा इसरो

जैसे जैसे ट्रेन फाटक के पास पहुंचेगी, हूटर वैसे वैसे तेज बजने लगेगा और ट्रेन के गुजरने के बाद वह बजना बंद हो जाएगा।
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Jameel Ahmed Khan

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Updated: 12 Nov 2017, 9:53 PM IST

Unmanned Crossing

Unmanned Crossing

नई दिल्ली। मानवरहित रेल फाटकों पर होने वाली दुर्घटनाओं से परेशान रेलवे को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया है। ऐसे फाटकों पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एक उपग्रह वहां से गुजरने वाले वाहनों को ट्रेन के आने की सूचना देकर चौकन्ना कर देगा। साथ ही उपग्रह से ट्रेनों के संचालन पर भी नजर रखी जा सकेगी।

इस आकाशीय तकनीक को इसरो ने रेलवे को मुहैया करवाई है। तकनीक के जरिए जब भी मानवरहित फाटक के पास ट्रेन पहुंचेगी तो एक हूटर बज उठेगा जिससे वाहन चालक चौकन्ने हो जाएंगे। रेल मंत्रालय इसरो द्वारा मुहैया करवाई गई एकीकृत परिपथ (इंटीग्रेटेड सर्किट) चिप को १० हजार रेल इंजनों में लगाए गा। जब ट्रेन मानवरहित फाटक से 500 मीटर दूर होगी, तब आईसी चिप से मिले संकेत से हूटर बज उठेगा्र जिससे वाहन चालकों के साथ साथ रेल चालक भी चौकन्ने हो जाएंगे।

जैसे जैसे ट्रेन फाटक के पास पहुंचेगी, हूटर वैसे वैसे तेज बजने लगेगा और ट्रेन के गुजरने के बाद वह बजना बंद हो जाएगा। प्रायोगिक तौर पर दिल्ली-गुवाहाटी राजधानी रूट पर पडऩे वाले सोनपुर डिजिवन के दो मानवरहित फाटकों पर इसरो की इस तकनीक का प्रयोग किया जाएगा। इसके बाद दिल्ली-मुंबई रूट के अन्य मानवरहित फाटकों पर यह तकनीक अपनाई जाएगी।

रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह परीक्षण फिलहाल दिल्ली-मुंबई रूट पर किया जाएगा। इसके बाद योजना के अनुसार, इसरो की इस तकनीक का इस्तेमाल चरणबद्ध तरीके से देशभर के मानवरहित फाटकों पर किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि देशभर में करीब 8 हजार 254 मानवरहित फाटक हैं और 40 प्रतिशत दुर्घटनाएं इन फाटकों पर ही होती हैं। वहीं, 18 हजार फाटकों पर चौकीदार तैनात हैं।

आर्टिफिशल इंटेलीजेंस भविष्यवाणी कर सकती है कि क्या सोच रहा है मस्तिष्क
इंडियाना। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क पढऩे की तकनीक विकसित की है जो आर्टिफिशल इंटेलीजेंस (एआई) का इस्तेमाल कर इस बात की भविष्यवाणी कर सकती है कि हमारा दिमाग क्या सोच रहा है। एआई का यह तरीका संभवत: इस बात की व्याख्या कर सकता है कि मस्तिष्क क्या देख रहा है जिससे अंतत: दिमाग के कामकाज करने के तरीकों को समझने में मदद मिल सके।

दिमाग किस तरह से स्थिर प्रतिच्छाया को संसाधित करता है, इसे जानने के लिए शोधकर्ताओं ने 'कोनवोल्यूशनल न्यूरल नेटवक्र्स' तकनीक का इस्तेमाल किया। यह तकनीक एक तरीके से एल्गोरिथम की तरह होती है जो गणित में सवालों को हल करने के लिए इस्तेमाल की जाती है और ऐसी ही तकनीक का इस्तेमाल कंप्यूटर और स्मार्टफोन में चेहरा पहचानने के लिए किया जाता है।

शोध दल की प्रमुख अमरीका के इंडियाना शहर में स्थित पुरड्यू यूनिवर्सिटी में डॉक्टर की पढ़ाई कर रहे हाईगुआंग वेन ने कहा कि एल्गोरिथम का इस्तेमाल मस्तिष्क की प्रक्रियाओं को समझने के लिए तब किया गया जब इंसान प्राकृतिक दृश्यों को देख रहा हो ताकि इस बात की व्याख्या की जा सके के आस-पास की चीजों को देखकर वह क्या सोचता है। शोध में तीन महिलाओं को शामिल किया गया था।

शोध के लिए वैज्ञानिकों ने तीनों महिलाओं की ११.५ घंटों की एफएमआईआई का डाटा इकट्ठा जो उन्हें ९७२ वीडियो क्लिप दिखाकर संरक्षित किए गए थे। 'कोनवोल्यूशनल न्यूरल नेटवक्र्स' मॉडल का इस्तेमाल कर शोध टीम सही ढंग से महिलाओं द्वारा वीडियो देखने के दौरान उनका एफएमआईआई का डाटा डिकोड करने में सफल रही।

शोधकर्ताओं द्वारा इस खोज को महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भविष्य में इससे मस्तिष्क के अध्यनन करने में और मदद मिलेगी। वहीं, यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर होंगमिंग लियू ने कहा कि हमें लगता है कि हम मशीन इंटेलीजेंस (यंत्र बुद्धि) और तंत्रिका विज्ञान के नए युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां पर ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर शोध का काम चल रहा है।