सीहोर. एक तरफ मंहगाई रिकार्ड बनाने लगी हैऔर दूसरी तरफ उपज के भाव गिरकर जमीन पर आ रहे हैं।ऐसे में कैसे खेती लाभ का धंधा बनेगी।जिस उपज को पैदा करने में किसान को चार महीने लग जाते हैं, उसके आने पर मायूसी हाथ लगती है।गांव में मूलभूत सुविधा का टोटा बना है।इन समस्या को लेकर कई बार अफसर, जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया।उनकी तरफ से ध्यान देकर निराकरण कराना मुनासिब नहीं समझा है।
जिले के आष्टा तहसील के गांव सेवदा में आयोजित हुई पत्रिका एग्रो क्लब की बैठक में किसानों ने यह बात कहीं। बैठक में दो दर्जन किसानों ने क्लब की सदस्य लेते हुए बताया कि गांव में बारिश के मौसम में भी पानी का संकट बना हुआ है।यह पिछले पांच महीने से है। कहने को तो एक दर्जन से अधिक हैंडपंप लगे हैं, लेकिन शोपीस बनकर शोभा बढ़ाने के काम आ रहे हैं।एक हैंडपंप जरुर चल रहा है, उसी से पानी भरकर लोग काम चला रहे हैं।लाखों रुपए की नलजल योजना प्यास बुझाने सार्थक साबित नहीं हुई।इससे करीब साढ़े तीन से अधिक आबादी परेशानी भोग रही है। गांव में हर कहीं गंदगी का अंबार लगा हुआ है।
किसानों ने बताया कि इस समय गेहूं, चना, सोयाबीन सहित अन्य उपज के भाव कम हैं। किसान इनको मंडी में बेचता है तो उसको नुकसान होता है। इस उपज को पैदा करने में मेहनत, लागत को जोड़ा जाए तो कई बार यह स्थिति बनती हैकि कुछ हाथ नहीं लगता है।धूप हो या फिर कड़ाके की सर्दी या बारिश इन सब में किसान मेहनत कर अन्न उगाता है।उसको अच्छे दाम में नहीं खरीदा जाता है। किसान तभी सफल हो पाएगा, जब उसको उपज के वाजिब दाम मिल सकेंगे।अभी हालत हैकि पिछले साल सीजन में सोयाबीन को जिस भाव में बेचा था, उसके भाव बोवनी में और कम हो गए हैं। इसी प्रकार प्याज की अच्छी पैदावार होने पर सोचा था कि कुछ फायदा मिलेगा। उसको समर्थन केंद्रों पर बेचने में फजीहत उठाना पड़ रही है। प्याज को आष्टा केंद्र पर लेकर गए, वहां से तुलाई के बाद सीहोर भेज दिया। इसमें वाहन का डीजल,भाड़ा और लागत को मिलाया जाए तो नुकसान ही सामने आएगा। किसानों को उपज के अच्छे भाव मिलने चाहिए, तभी दिन फिरेंगे।
किसान मंडी में उपज बेचने जाता है तो नकद रुपए देने की बजाए चैक या फिर आरटीजीएस किया जाता है। इस रुपए को निकालने बंैकों के चक्कर काटना पड़ते हैं। कई बार समय पर चैक क्लीयर नहीं होता है। इससे कामकाज रुक जाते हैं। किसानों ने बताया कि पशुपालन कर दूध का व्यवसाय करने पर जोर दिया जा रहा है। डेयरी के फेट में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की जा रही है। इससे पशुपालन करना भी घाटे का सौदा बनने लगा है। पशुपालन करने मेें भूसा, अन्य आहार खिलाना पड़ता है, तब कहीं जाकर मवेशी दूध देते हैं। दूध भी पर्याप्त भाव में नहीं बिक पाता है।
किसानों ने कहा कि बिजली की कम खपत के बाद भी बिजली कंपनी मनमानी राशि के बिल थमा रही है।जब उनसे बिल की राशि कम करने की बात कहीं जाती है तो ध्यान नहीं दिया जाता है। मजबूरी मेें बिल के अनुसार राशि जमा कराना पड़ती है। नहीं कराने पर कनेक्शन काटने कीधमकी दी जाती है। कई के बिल में बढ़कर राशि आई है। कंपनी का उदासीन रवैया भारी पड़ रहा है।इसी प्रकार खेत तक आने जाने पक्की सड़क नहीं बन सकी है।मुख्यमंत्री खेत सड़क योजना चालू होने पर लगा था कि अब दिन फिरेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। इस अवसर पर महेश कुमार चौधरी, मिश्रीलाल चौधरी, नर्बत सिंह, रामलाल, काशीराम, मांगीलाल, प्रफुल्ल चौधरी, नारायण सिंह, प्रहलाद सिंह, हेमराज सिंह, करण सिंह उपस्थित थे।