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Shujalpur News: चार बेटियों ने पहले उठाई पिता की अर्थी, 45 दिन बाद मां को भी दिया कंधा, अंतिम विदाई देख रो पड़ा शहर

Parents Last Rites: शुजालपुर में चार बेटियों ने माता-पिता के प्रति ऐसा फर्ज निभाया, जिसे देखकर हर आंख नम हो गई। 45 दिन में पहले पिता और फिर मां को बेटियों ने अंतिम कंधा दिया।
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four daughters parents last rites 45 days

Parents Last Rites: चार बेटियों ने माता-पिता को नम आंखों से दी अंतिम विदाई (फोटो सोर्स- Patrika)

Four daughters parents last rites: बदलते सामाजिक परिवेश में बेटियां अब केवल परिवार की जिम्मेदारियां ही नहीं निभा रहीं, बल्कि माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्य को भी पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के शुजालपुर में ऐसा ही भावुक और प्रेरक उदाहरण सामने आया, जहां चार बेटियों ने अपने माता-पिता के निधन के बाद अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली। महज 45 दिनों के अंतराल में बेटियों ने पहले पिता और फिर मां की अर्थी को कंधा दिया और अंतिम संस्कार की रस्मों को पूरे रीति-रिवाज के साथ निभाया। बेटियों को माता-पिता के अंतिम समय तक फर्ज निभाता देख पूरा शहर की आंखें नम हो गई।

45 दिन के अंदर माता-पिता को खोया, दोनों की अर्थियों को दिया कंधा

शहर के अधिवक्ता एवं सेवानिवृत्त शासकीय सेवक छोटेलाल नेमा का 17 जुलाई को निधन हुआ था। उनकी चारों बेटियों ने पिता की अंतिम यात्रा में शामिल होकर अर्थी को कंधा दिया। पुत्री अलका नेमा ने अपने चचेरे भाइयों के साथ मिलकर पिता को मुखाग्नि दी।
अभी परिवार इस वियोग से उबर भी नहीं पाया था कि रविवार, 30 अगस्त को मां मखमली नेमा का भी निधन हो गया। इस बार भी बेटियों ने ही आगे बढ़कर मां की अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई। बेटियों के इस कदम ने यह संदेश दिया कि माता-पिता के प्रति कर्तव्य निभाने में बेटा-बेटी का भेद नहीं होना चाहिए।

पांच साल पहले चुनाव में ड्यूटी के दौरान आया था हार्ट अटैक, बेटियों ने दी मुखाग्नि

बता दें कि, यह पहले मामला नहीं है जहां बेटियों ने माता-पिता को अंतिम विदाई देने के साथ अंतिम संस्कार की रस्मों को पूरे रीति-रिवाज के साथ निभाया है। नेमा समाज में कर्तव्य और सामाजिक जिम्मेदारी का ऐसा ही उदाहरण करीब पांच साल पहले भी सामने आया था। विधानसभा चुनाव ड्यूटी के दौरान शिक्षक अनिल कुमार नेमा का हृदयाघात से निधन हो गया था। परिवार ने उस कठिन परिस्थिति में अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाने के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर लोकतांत्रिक कर्तव्य भी पूरा किया था। बेटियों द्वारा माता-पिता को अंतिम कंधा देने की यह पहल समाज में बदलती सोच और बेटियों की बढ़ती जिम्मेदारी का संवेदनशील उदाहरण बनकर सामने आई है।