
'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के कुलजीत से 'बदमाश कंपनी' के निर्देशक तक, परमीत सेठी ने अपनी पहचान को नये आयाम दिए। (फोटो डिजाइन :ChatGPT)
सिनेमा की दुनिया भी अजीब है। यहां कभी एक किरदार कलाकार को अमर बना देता है, तो कभी वही किरदार उसकी प्रतिभा के चारों ओर अदृश्य दीवारें खड़ी कर देता है। परमीत सेठी की कहानी इसी विरोधाभास से बुनी गई है। 14 अक्टूबर 1961 को जन्मे परमीत बुधवार को अपना 65वां जन्मदिन मना रहे हैं। तीन दशक पहले आई आदित्य चोपड़ा की फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में उन्होंने कुलजीत सिंह का किरदार निभाया था। दर्शकों की स्मृतियों में वह चेहरा आज भी मौजूद है, लेकिन इस शोहरत के पीछे छिपी है एक अभिनेता की अधूरी उम्मीदों, मुश्किल फ़ैसलों और नए रास्ते तलाशने की दास्तान।
वर्ष 1995 की इस ऐतिहासिक प्रेमकथा में कुलजीत की भूमिका आसानी से परमीत की झोली में नहीं आई थी। उनकी अपनी आपबीती के अनुसार, भूमिका के लिए पहले किसी दूसरे कलाकार को चुना जा चुका था। परमीत को लगा कि वह इस पात्र में जान डाल सकते हैं। लगभग पंद्रह दिनों की बेचैनी के बाद उन्होंने आदित्य चोपड़ा से अभिनय-परीक्षण का अवसर मांगा। पत्नी अर्चना पूरन सिंह ने उन्हें किरदार की बोलचाल और तौर-तरीक़े समझने में मदद की। परीक्षण देखकर आदित्य ने उन्हें अपना कुलजीत स्वीकार कर लिया। यह उनकी हिंदी फ़िल्मों में यादगार शुरुआत बनी।
कुलजीत का अक्खड़ स्वभाव, दबंग अंदाज़ और सिमरन से विवाह करने की ज़िद कहानी के तनाव का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे। मगर इस अभिनय की सफलता ने निर्माताओं की निगाह में परमीत की एक निश्चित छवि बना दी। उनके अनुसार, फ़िल्म के बाद अधिकतर प्रस्ताव नकारात्मक पात्रों के थे। वह मुख्य खलनायक के बजाय उसके बेटे या भाई जैसी छोटी भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने कई प्रस्ताव ठुकरा दिए। बाद में उन्हें एहसास हुआ कि लगातार पर्दे से ग़ायब रहना भी कलाकार के लिए नुक़सानदेह हो सकता है
| वर्ष | फ़िल्म / धारावाहिक | प्रमुख पहचान |
|---|---|---|
| 1995 | दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे | कुलजीत |
| 1996 | दिलजले | सहायक अभिनेता |
| 2000 | धड़कन | बॉबी |
| 2004 | लक्ष्य | सैन्य अधिकारी |
| 2003–06 | जस्सी जैसी कोई नहीं | राज मल्होत्रा |
| 2023 | मिशन मजनू | आर. एन. काव |
संदर्भ: कलाकार की फ़िल्मोग्राफ़ी, आईएमडीबी तथा प्रकाशित करियर विवरण।
परमीत ने अक्टूबर 2025 में एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि शुरुआती दौर में भूमिकाओं को लेकर अत्यधिक चयनशील होना उनके करियर के लिए कठिन साबित हुआ। आदित्य चोपड़ा ने बाद में उन्हें सलाह दी थी कि शुरुआती अवसरों को यूं ही गंवाना ठीक नहीं था। परमीत का अनुभव बताता है कि फ़िल्म उद्योग में प्रतिभा के साथ निरंतर उपस्थिति भी महत्त्व रखती है। हालांकि कलाकार को हर प्रस्ताव स्वीकार करना चाहिए, यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं; प्रश्न अवसर और रचनात्मक संतुष्टि के बीच संतुलन का है।
परमीत ने अक्टूबर 2025 में ही एक अन्य बातचीत के दौरान दावा किया था कि एक-दो फ़िल्मों में मुख्य खलनायक चुने जाने के बावजूद उन्हें बदल दिया गया। उनके अनुसार, कुछ नायकों को आशंका थी कि उनकी स्क्रीन पर मौजूदगी ज़्यादा प्रभावशाली साबित हो सकती है। उन्होंने किसी कलाकार का नाम नहीं लिया और इसे फ़िल्म उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक असुरक्षा से जोड़ा। इन घटनाओं का स्वतंत्र विवरण सार्वजनिक रूप से पुष्ट नहीं है, इसलिए इन्हें परमीत के व्यक्तिगत अनुभव के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
इस प्रेमकथा को परमीत ने एक दिलचस्प नज़रिए से भी देखा है। अक्टूबर 2025 की बातचीत में उन्होंने सवाल उठाया था कि कुलजीत की दृष्टि से राज को नायक कैसे माना जाए, जबकि वह उसकी मंगेतर सिमरन से प्रेम करता है। यह टिप्पणी हल्के-फुल्के अंदाज़ में की गई थी, लेकिन इससे कहानी की एक दूसरी परत खुलती है। हालांकि सिमरन की अपनी इच्छा और विवाह का अधिकार भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यहीं सिनेमा का सौंदर्य है—एक ही घटना अलग-अलग पात्रों की निगाह में अलग अर्थ ग्रहण कर सकती है।
अभिनय में सीमित अवसरों के बीच परमीत ने लेखन और निर्देशन का रास्ता चुना। वर्ष 2010 में उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म 'बदमाश कंपनी' प्रदर्शित हुई। यशराज फ़िल्म्स के निर्माण में बनी इस कहानी के लेखक भी परमीत थे। शाहिद कपूर और अनुष्का शर्मा अभिनीत फ़िल्म में चार नौजवानों की आर्थिक महत्वाकांक्षा, तेज़ी से पैसा कमाने की चाह और नैतिक दुविधाओं को दिखाया गया। यह उनके रचनात्मक सफ़र का महत्त्वपूर्ण मोड़ था—जहां वह केवल किसी दूसरे की लिखी कहानी के पात्र नहीं, बल्कि अपनी कहानी के शिल्पकार बने।
| साल | पड़ाव | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| 1995 | कुलजीत | पहचान |
| 1996 | दिलजले | दूसरी सफलता |
| 2004 | लक्ष्य | विविध अभिनय |
| 2010 | बदमाश कंपनी | निर्देशन की शुरुआत |
| 2010 | पटकथा लेखन | स्वयं लेखक |
| 2011 | ज़ी सिने पुरस्कार | निर्देशन नामांकन |
संदर्भ: यशराज फ़िल्म्स का आधिकारिक विवरण और ज़ी सिने पुरस्कार नामांकन अभिलेख।
परमीत के लिए यश चोपड़ा केवल बड़े निर्माता नहीं, बल्कि सिनेमा की व्यावहारिक समझ देने वाले मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने एक साक्षात्कार में याद किया कि यश चोपड़ा उत्पादन की लागत और पर्दे पर दिखाई देने वाले परिणाम के बीच संतुलन को बहुत महत्त्व देते थे। उनकी सोच थी कि फ़िल्म की आर्थिक सफलता में सही बजट का निर्णायक योगदान होता है। इस अनुभव ने परमीत को अभिनय के साथ फ़िल्म निर्माण की व्यावसायिक जटिलताओं को समझने का अवसर भी दिया।
फ़िल्मों के अतिरिक्त परमीत ने टेलीविज़न और डिजिटल माध्यमों में भी अपनी मौजूदगी बनाए रखी। 'जस्सी जैसी कोई नहीं' जैसे धारावाहिक से लेकर 'स्पेशल ऑप्स' जैसी जासूसी शृंखला तक उनकी यात्रा अलग-अलग तरह के पात्रों से गुज़री। वर्ष 2023 की फ़िल्म 'मिशन मजनू' भी उनके अभिनय सफ़र में दर्ज है। इससे स्पष्ट होता है कि कुलजीत उनकी सबसे लोकप्रिय पहचान भले रहा हो, मगर उनका काम उसी एक किरदार तक सीमित नहीं रहा।
परमीत सेठी की कहानी केवल एक अभिनेता के अवसर खोने की दास्तान नहीं, बल्कि अपनी पहचान को नए अर्थ देने की कोशिश भी है। कुछ भूमिकाएं ठुकराने का अफ़सोस, फ़िल्म उद्योग की अनिश्चितताएं और निर्देशन का साहस—इन सबने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को आकार दिया। आज भी दर्शक उन्हें कुलजीत के नाम से पहचानते हैं, लेकिन उस चेहरे के पीछे लेखक, निर्देशक और अनुभवी अभिनेता की लंबी यात्रा मौजूद है। शायद कला की असली सफलता यही है कि कलाकार एक किरदार से याद किया जाए, मगर उसकी पहचान उस किरदार पर समाप्त न हो।
बहरहाल, 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के कुलजीत ने परमीत सेठी को शोहरत दी, लेकिन नकारात्मक भूमिकाओं की एक जैसी पेशकश ने उनके अभिनय विकल्प सीमित कर दिए। 65वें जन्मदिन पर जानिए, कैसे उन्होंने करियर की ठोकरों से सीखकर लेखन, निर्देशन और अलग-अलग माध्यमों में अपनी रचनात्मक पहचान बनाई।
Updated on:
14 Oct 2026 07:19 pm
Published on:
14 Oct 2026 07:19 pm
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