3 नवंबर 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Making of Modi-1 : 17 की उम्र में घर छोड़ निकले दुनिया समझने

लगन, निष्ठा, साहस, दूरदृष्टि और पक्का इरादा। इन पंच शब्दों का बड़ा पर्याय कोई बना तो वह है नरेन्द्र्र दामोदर दास मोदी।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

सूरत

•

image

Rajesh Kasera

•

Updated: 29 May 2019, 9:09 PM IST

modi

Making of Modi : 17 की उम्र में घर छोड़ निकले दुनिया समझने

- राजेश कसेरा


लगन, निष्ठा, साहस, दूरदृष्टि और पक्का इरादा। इन पंच शब्दों का बड़ा पर्याय कोई बना तो वह है नरेन्द्र्र दामोदर दास मोदी। महज 17 वर्ष की उम्र में जीवन के अर्थ को समझने और लक्ष्य को भेदने के लिए युवा मोदी ने घर और परिवार का मोह छोड़ दिया। वडनगर से अहमदाबाद आए और प्रचारक का चोला धारण कर उद्देश्यों की पूर्ति में लग गए। सेवा और संकल्प की राह पर चलने के जुनून ने ही छोटे से गांव के बालक नरेन्द्र को देश का नायक बना दिया। मोदी के जीवन की यात्रा कतई भी आसान नहीं रही। न जाने कितने त्याग उनको करने पड़े, अपमान के घूंट पीने पड़े। इतना ही नहीं, तिरस्कार तक झेलना पड़ा। लेकिन, कर्मशील प्रवृत्ति ने मन और इरादों को तटस्थ बनाए रखा।

दृढ़ता की जो परिभाषा मोदी ने समझी, उसकी हर इबारत को उन्होंने 2001 से 2014 के बीच के सफर में साकार कर दिखाया। दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने मोदी ने दूसरों की खींची गई पंक्ति के साथ आगे बढऩे के बजाय अपनी रेखा को बढ़ा करके चलने का निर्णय किया। वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान स्टेशन से गुजर रहे सैनिकों को चाय पिलाने के दौरान ही मोदी ने ठान लिया था कि देश की रक्षा करने वाले सपूतों के लिए काम करने का मौका मिलेगा तो कंधे से कंधा मिलाकर सशक्त बनाएंगे। यही कारण रहा कि बीते पांच वर्षों में मोदी ने सेना के तीनों की अंगों को मजबूत बनाने के लिए हरसंभव प्रयास किए। संघ के प्रचारक से राजनीति के मैदान में प्रवेश करने की यात्रा भी काफी रोचक और चुनौतियों से भरी रहीं।

वर्ष 1990 में सोमनाथ से अयोध्या के लिए लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने रथयात्रा निकाली तो मोदी उनके सारथी बनकर रहे और 'अर्जुन' की तरह राजनीति का ज्ञान भी अर्जित कर लिया। यह सीखने की हर ललक थी कि प्रचंड बहुमत के साथ 2019 के आम चुनाव में जीत के बाद जनता को धन्यवाद देने के बाद मोदी आडवाणी का आशीर्वाद लेने गए। इतना ही नहीं, 1991 में मुरली मनोहर जोशी की कन्याकुमारी से श्रीनगर की एकता यात्रा में भी मोदी केन्द्रीय किरदार बने। बड़े कद के नेताओं के छांव में लोकप्रियता पाने वाले वडनगर के नरिया (बचपन का नाम) को कदम-कदम पर पता था कि किन ऊंचाइयों को छूना है और बुलंदी के शिखर पर कैसे टिकना है।

तभी तो 2014 के चुनाव में 2022 का लक्ष्य रखा और 2019 के चुनाव में 2030 का। मोदी की लोकप्रियता का पैमाना इससे ही माना जा सकता है कि जिनता उनके खिलाफ बोला गया, उनकी साख उतनी ही बढ़ गई। देश को श्रेष्ठता का दर्जा देने वाले मोदी का सबसे बड़ा मूलमंत्र भी यही है कि छोटे-छोटे काम करके भी सब भारत को मजबूत बना सकते हैं, बस नीयत नेक हो।

बड़ी खबरें

View All

सूरत

गुजरात