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गर्भ में मौत, जन्म के बाद भी नहीं बच रहे मासूम; राजसमंद में 17 माह में 1476 मौतें

अप्रैल से अगस्त 2026 तक 333 बच्चों की मौत दर्ज हुई। इनमें 117 मृत जन्म और 216 जन्म के बाद हुई मौतें शामिल हैं। इससे पहले वित्तीय वर्ष 2025-26 में 1143 बच्चों की मौत दर्ज की गई थी। जिले में 17 माह का कुल आंकड़ा 1476 पहुंच गया। इस अवधि में 13,967 गर्भवती महिलाओं की जांच हुई। जननी सुरक्षा योजना पर करोड़ों रुपए खर्च के बावजूद बच्चों की मौतें चिंता का विषय बनी हुई हैं।
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मासूम की मौत

राजसमंद. मां की गोद में आने से पहले ही किसी नन्ही जिंदगी का दम तोड़ देना और जन्म के कुछ समय बाद ही घर की खुशियां मातम में बदल जाना... ये सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द है, जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। राजसमंद जिले के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज बच्चों की मौत के आंकड़े ऐसी ही एक गंभीर तस्वीर सामने रख रहे हैं। अप्रैल से अगस्त 2026 तक महज पांच महीनों में जिले में 333 बच्चों की मौत दर्ज हुई। इनमें 117 बच्चे मृत पैदा हुए, जबकि 216 बच्चों ने जन्म लेने के बाद दम तोड़ दिया। यानी पांच महीनों में हर दिन दो से ज्यादा बच्चों की मौत सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुई। चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है कि इससे पहले वित्तीय वर्ष 2025-26 में भी जिले में 1143 बच्चों की मौत दर्ज की गई थी। इस तरह उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, जिले में 17 माह में बच्चों की मौत का आंकड़ा 1476 तक पहुंच गया। ये आंकड़े गर्भावस्था के दौरान देखभाल, सुरक्षित प्रसव और जन्म के बाद नवजात की निगरानी जैसी व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

13,967 गर्भवतियों की जांच, फिर भी 333 बच्चों की मौत

गर्भवती महिलाओं और उनके होने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से जांच और निगरानी की व्यवस्था है। अप्रैल से अगस्त के बीच जिले में 13,967 गर्भवती महिलाओं का पंजीयन कर जांच की गई। गर्भावस्था के दौरान 12, 20, 28 और 36 सप्ताह पर जांच का प्रावधान है। इसमें ब्लड प्रेशर, हीमोग्लोबिन, यूरिन, शुगर, ब्लड ग्रुप, एचआईवी, थायराइड, हेपेटाइटिस, वजन और पोषण की जांच शामिल है। हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान कर विशेषज्ञ उपचार का भी प्रावधान है। इसके बावजूद इसी अवधि में 117 मृत जन्मे और 216 बच्चों की जन्म के बाद मौत दर्ज होना चिंता का विषय है।

सुरक्षित प्रसव के लिए करोड़ों का खर्च, फिर भी नहीं थम रहीं मौतें

गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा देने के लिए जननी सुरक्षा योजना संचालित है। इसके तहत दवा, जांच, भोजन, परिवहन और जरूरत पड़ने पर रक्त उपलब्ध कराने का प्रावधान है। वर्ष 2026-27 में योजना के लिए करीब 3 करोड़ रुपए का बजट है। अप्रैल से अगस्त तक 29.71 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। वहीं, वित्तीय वर्ष 2025-26 में योजना पर 2 करोड़ 94 लाख 25 हजार 600 रुपए खर्च हुए। योजना के तहत सुविधाएं उपलब्ध कराने और उन पर खर्च के बावजूद बच्चों की मौतों का सिलसिला जारी रहना व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर मौतों को स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जोड़ना उचित नहीं होगा। इसके लिए प्रत्येक मामले के कारणों और उपचार की परिस्थितियों की विस्तृत जांच जरूरी है।

जिले के सबसे बड़े अस्पताल में ही 112 मौतें

जिले के सबसे बड़े आरके अस्पताल में भी बच्चों की मौत के आंकड़े सामने आए हैं। अप्रैल से अगस्त के बीच यहां जन्म से पहले या जन्म के बाद 112 बच्चों की मौत दर्ज हुई। विभागीय स्तर पर कई मामलों को गंभीर प्रसव और बाहर से रेफर होकर आए मरीजों से जोड़कर बताया जाता है। लेकिन पड़ताल में यह भी सामने आया कि इन मामलों में बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की थी, जो आरके अस्पताल में ही भर्ती थे और उपचाराधीन थे। ऐसे में केवल रेफर होकर आने की बात कहने से पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट नहीं होती। मौतों के कारणों, मरीजों की स्थिति और उपचार के दौरान सामने आई चुनौतियों की जानकारी भी महत्वपूर्ण है।

दो दिन में मासूम ने तोड़ा दम, दूसरे केस में चार माह में मौत

पड़ताल के दौरान सेलूगढ़ा गांव की एक महिला के मामले में सामने आया कि उसने 16 तारीख को बच्चे को जन्म दिया और जन्म के दो दिन बाद ही मासूम की मौत हो गई। वहीं सालवाड़ा गांव में एक महिला के प्रसव के बाद उसके बच्चे की करीब चार महीने में मौत हो गई। ये मामले उन 216 मौतों की मानवीय तस्वीर सामने रखते हैं, जो जन्म के बाद दर्ज हुईं।

आंकड़ों की पड़ताल: एक नजर में

333 - अप्रैल से अगस्त 2026 तक जिले में बच्चों की मौत

117- जिले में मृत जन्म के मामले

216 - जिले में जन्म के बाद बच्चों की मौत

112 - आरके अस्पताल में अप्रैल-अगस्त के दौरान जन्म से पहले या बाद की मौतें

1476 - जिले में 17 माह में बच्चों की कुल मौतें

13,967- जिले में अप्रैल-अगस्त में गर्भवती महिलाओं का पंजीयन कर जांच

29.71 लाख रुपए- जिले में पांच महीनों में जननी सुरक्षा योजना पर खर्च

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

मां और बच्चे की कई स्थितियां बन सकती हैं वजह

एमडी फिजिशियन एवं सेवानिवृत्त चिकित्सक डॉ. एलसी सोनी के अनुसार गर्भ में बच्चे की मृत्यु के कई कारण हो सकते हैं। इनमें गर्भवती महिला का उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गर्भावस्था के दौरान होने वाले संक्रमण, अधिक उम्र में गर्भधारण, धूम्रपान या शराब का सेवन, गर्भावस्था में देर से अस्पताल पहुंचना तथा आनुवंशिक कारण शामिल हैं। नवजात की मृत्यु के प्रमुख कारणों में समय से पहले जन्म, आनुवंशिक एवं जन्मजात विकार, जन्म के समय कम वजन, जन्म के दौरान चोट, फेफड़ों से जुड़ी गंभीर समस्याएं और संक्रमण शामिल हो सकते हैं।

शिशु मृत्यु के कई कारण

स्त्री रोग की विशेषज्ञ डॉक्टर मीना पगारिया ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान मां में खून की कमी, पौष्टिक आहार का अभाव, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, गर्भनाल (प्लेसेंटा) से संबंधित समस्याएं और संक्रमण गर्भ में शिशु की मृत्यु के प्रमुख कारण हो सकते हैं। लंबे समय तक प्रसव प्रक्रिया चलने के दौरान शिशु के मेकोनियम (पहला मल) को सांस के जरिए फेफड़ों में चले जाने से गंभीर परेशानी हो सकती है। इसके अलावा, आनुवंशिक और क्रोमोसोमल विसंगतियां भी नवजात की मृत्यु का कारण बन सकती हैं।

इनका कहना

बच्चों की मौत के मामलों में प्रीमेच्योरिटी, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी, पोषण की कमी और बाल कुपोषण जैसी स्थितियां सामने आती हैं। विभाग की ओर से आवश्यक जांच और उपचार किया जाता है। कई मामलों में चिकित्सकीय सलाह का पालन नहीं होने से भी परेशानी सामने आती है।

डा. हेमंत कुमार बिंदल, सीएमएचओ, राजसमंद

बच्चों की मृत्यु के पीछे जन्मजात विकार, आनुवंशिक कारण, जन्म के समय होने वाली जटिलताएं, ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया) और नवजात का कमजोर या कम वजन का होना जैसे कारण हो सकते हैं। उनके अनुसार, पहले की तुलना में बच्चों की मृत्यु के मामलों में कमी आई है और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ है।

- डॉ. रमेश रजक, पीएमओ, आरके अस्पताल, राजसमंद