
ज्योति जैन/राजसमंद. किस्मत ने जाने कौनसी स्याही से इनकी जिन्दगी की किताब लिखी है। अभी ठीक से कुछ समझना भी शुरू नहीं किया था कि वक्त ने इन्हें जिन्दगी की ठोकरें देना शुरू कर दी। ये कहानी है नाथद्वारा के तेलियों का तालाब, वार्ड संख्या 2 कनवा बस्ती में रहने वाले दो मासूम बच्चों की। 10 और 11 वर्षीय ये बालक माता-पिता के होते हुए भी अनाथों जैसी जिन्दगी गुजारने को मजबूर हैं। पड़ोस की महिलाएं इनकी देखभाल कर रही हैं, लेकिन वो नाकाफी है।
पांच साल पहले पिता और मां के बीच अनबन के चलते मां अन्यत्र चली गई। उसके बाद पिता भी बच्चों के साथ नहीं रहता। अब ना इन बच्चों के पास माता-पिता का साया है ना कोई और जिसे वे अपना कह सकें। ऐसे में ये मासूम एक कमरे के टूटे-फूटे और बिना छत के मकान में अकेले रहने को मजबूर हैं। बच्चे कड़ाके की इस सर्दी में रात भर खुले आसमान के नीचे ठिठुर रहे हैं। इनके पास जिन्दगी बसर करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। पूरा दिन तो ये बच्चे पड़ोस में किसी के घर गुजार लेते हैं, लेकिन रात उन्हें अपने बिना छत के घर में ही बितानी पड़ती है।
छिन न जाए आशियाना
पिछले 5 सालों से घर में किसी बड़े के अभाव में कुछ लोग इनकी जमीन पर अवैध कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अगर ये जमीन भी बच्चों से किसी ने छीन ली तो बच्चों का भविष्य अन्धकारमय हो जाएगा।
पड़ोसी महिलाएं यशोदा बन कर रही पालन-पोषण
बच्चों के मां-बाप के छोड़ जाने के बाद से पड़ोस में रहने वाली जशोदा टेलर, मंजू सिंधी और आशा टेलर इन बच्चों की देखरेख कर रही हैं। बच्चों के खाने, कपड़ों, स्कूल आदि का खर्च ये तीनों महिलाएं आपस में मिल-बांट कर वहन करती हैं। वहीं, इस बात का भी पूरा ध्यान रखती है कि समाजकंटकों से भी वे इन बच्चों को दूर रख सकें। उनका कहना है कि कई बार वे इन बच्चों के घर को पक्का करवाकर छत डलवाने के लिए पार्षद और अन्य नेताओं से गुजारिश कर चुके, लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकल पाया है।
कर रहे हैं मदद के प्रयास
बच्चों की पढ़ाई के लिए कुछ एनजीओ से बात की है। मोहल्ले वालों से बात कर उचित मदद की कोशिश कर रहे हैं।
प्रवीण पालीवाल, पार्षद वार्ड संख्या दो, नाथद्वारा
Updated on:
05 Jan 2018 03:25 pm
Published on:
04 Jan 2018 03:02 pm
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