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बसपा, सपा के बाद बीजेपी भी हुई विवश, आखिरकार करना पड़ रहा यह काम

सत्ता मिलते ही लगने लगते हैं आरोप, जानिए क्या है कहानी
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वाराणसी

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Devesh Singh

•

Updated: 8 Feb 2018, 12:37 PM IST

Political Party

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वाराणसी. यूपी की राजनीति में बसपा, सपा के बाद बीजेपी भी विवश हो चुकी है। जब तक यह दल सत्ता के बाहर रहते हैं तो एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, लेकिन जब सत्ता मिलती है तो फिर वही काम करने लगते हैं इसके चलते चुनाव आने से पहले बहुमत के लिए राजनीतिक दलों को विवश होना पड़ता है।
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बसपा, सपा व बीजेपी में सत्ता के दौरान खास जातियों को बढ़ावा देने का आरोप लगता है। सत्ता में रहते हुए यह दल आरोपों पर ध्यान नहीं देते हैं और अपने परम्परागत वोटरों को लाभ देने में जुटे रहते हैं। चुनाव का समय आता है तो इन दलों को छोटे जातिगत दलों की जरूरत होती है और उनसे गठबंधन करके सबको साथ लेकर चलने की बात करते हैं। संसदीय चुनाव २०१९ आने वाला है इसके चलते फिर से छोटे दलों से गठबंधन की रणनीति बनने लगी है।
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बसपा ने अभी तक सपा के साथ ही गठबंधन के संकेत दिये है, लेकिन इस दिशाा में सार्थक पहल नहीं हो पायी है। बसपा सुप्रीमो मायावती जानती है कि संसदीय चुनाव में अपनी धमक दिखाने के लिए परम्परागत वोटरों के साथ अन्य जाति के मतदाताओं की भी जरूरत है इसलिए गठबंधन की राजनीति या किसी खास जाति के नेता का साथ लेने की जरूरत है। सपा पर भी एक जाति की राजनीति करने का आरोप लगता आया है। वर्ष 2014 का संसदीय चुनाव हो या फिर यूपी विधानसभा चुनाव 2017। निकाय चुनाव तक में सपा को सफलता नहीं मिल पायी है इसके बाद अखिलेश यादव ने अन्य जातियों को सपा से जोडऩे के लिए जनवादी पार्टी जैसे दलों के साथ गठबंधन करने की तैयारी की है। बनारस में हुई रैली में अखिलेश यादव ने जनवादी पार्टी की रैली में बतौर मुख्य अतिथि कहा था कि सभी पिछड़े एक हो जाये तो माहौल बदल सकते हैं। सपा जब सरकार में थी तो सभी पिछड़ों को एक नहीं कर पायी थी, लेकिन अब अन्य पिछड़ों की पार्टी को याद आ रही है।
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बीजेपी पर लग रहे आरोप, सहयोगी दलों का साथ जरूरी
सपा पर जाति की राजनीति का आरोप लगानी वाली बीजेपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी इसी आरोपों में घिरते जा रहे हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ पर सर्वणों की एक जाति पर ज्यादा ध्यान देने का आरोप लग रहा है। लगातार तबादले व पोस्टिंग के बाद आरोपों को दम मिलता जा रहा है। बीजेपी जानती है कि यूपी चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के पीछे सहयोगी दल सुभासपा व अपना दल का भी महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए चुनाव के पहले सुभासपा के लगातार हमला करने के बाद भी बीजेपी सहयोगी दल से किनारा नहीं कर पा रही है।
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