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Talk with writer: मुश्किल है प्रेमचंद और मुक्तिबोध के लेखन स्तर को छूना
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Talk with writer: मुश्किल है प्रेमचंद और मुक्तिबोध के लेखन स्तर को छूना

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अजमेर

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raktim tiwari

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Updated: 1 Mar 2019, 5:50 PM IST

रक्तिम तिवारी/अजमेर.

मौजूद दौर में साहित्य, लेखन, अध्यायन सहित सभी विधाओं में विघटन जारी है। प्रेमचंद और मुक्तिबोध जैसे कालजयी लेखकों के स्तर को छूना अभी भी लेखकों के लिए सपना है। हालांकि यह मुश्किल नहीं है। अलबत्ता लेखन में साफगोई, सामाजिक हित और नैतिकता हो यह आज भी संभव है। यह बात साहित्यकार, कवि, लेखक और शिक्षक रमेश उपाध्याय ने पत्रिका से खास बातचीत में कही।

शैक्षिक संस्थानों में हिंदी की उपेक्षा से जुड़े सवाल का जवाब देते हुएउपाध्याय ने कहा कि हिंदी ही नहीं बल्कि सभी भाषाओं, लेखन, अध्यापन, अभियन, पत्रकारिता, सामाजिक और अन्य क्षेत्रों में गिरावट हो रही है। यह बेहद चिंता का विषय है। उदारीकरण और वैश्विकरण के दौर में तो इनमें तेजी से बदलाव हो रहे हैं। हालांकि पिछले 20-30 साल में नए लेखकों ने अच्छा लिखा है। लेकिन प्रेमचंद, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध जैसे कालजयी लेखकों के स्तर तक कोई नहीं पहुंच पाया है। ऐसा तब है जबकि पहले की अपेक्षाकृत सभी स्तर पर सुविधाओं और संसाधनों में बढ़ोतरी हुई है।

हिंदी को संरक्षण बहुत आवश्यक
उपाध्याय ने कहा कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय और सामान्य बोल-चाल की भाषा है। इसमें हिंग्लिश का प्रवेश होना चिंताजनक है। शब्दों का अर्थ जाने बगैर उनका इस्तेमाल किया जाने लगा है। व्याकरण, मात्रा और त्रुटि सुधार पर ध्यान नहीं दिया जाता। बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए अंग्रेजी माध्यम सर्वोपरी हो गया है। हिंदी को हमें अपने व्यवहार, विचार और संस्कार में अपनाना पड़ेगा। तभी वह संरक्षित हो सकेगी।

जिंदगी का अनुभव है किताब…
अपनी बात अपनों के साथ..पुस्तक पर चर्चा करते हुए उपाध्याय ने कहा कि यह मेरी निजी जिंदगी के अनुभव से जुड़ी है। इसमें अजमेर से शुरू किए शुरुआती संघर्ष, पत्र-पत्रिकाओं में लेखन, संपादन, दिल्ली यूनिवर्सिटी में अध्यापन कराने जैसी विधाएं शामिल हैं। यह पुस्तक मेरी पुत्री प्रज्ञा रोहिणी, संज्ञा उपाध्याय और दामाद राकेश कुमार ने मिलकर तैयार की है। इसमें पग-पग पर विभिन्न लोगों और जिंदगी से सीखे अनुभव शामिल हैं। यह पाठकों को कुछ-कुछ आत्मकथा के करीब लग सकती है।