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संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के प्रस्ताव के खिलाफ भारत और इजरायल ने किया मतदान, 180 देशों ने दिया समर्थन

क्षेत्रीय हथियार नियंत्रण पर पाकिस्तान और बेलारूस समर्थित प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र की प्रथम समिति में मंजूरी; भारत ने कहा- राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं, पुराने मुद्दों पर दोबारा चर्चा कराने की मंशा पर भी उठाए सवाल।
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Avaneesh Kumar Mishra

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Updated: 3 Nov 2026, 1:38 PM IST

भारत ने बताया वैश्विक मुद्दा, क्षेत्रीय नियंत्रण पर उठाए सवाल, PC- Chatgpt

संयुक्त राष्ट्र में क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियारों के नियंत्रण से जुड़े एक प्रस्ताव को लेकर भारत और इजरायल ने विरोध दर्ज कराया है। पाकिस्तान और बेलारूस की ओर से पेश किए गए इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने वाले भारत और इजरायल केवल दो देश रहे। संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में प्रस्ताव के समर्थन में 180 देशों ने मतदान किया, जबकि दो देशों ने इसके विरोध में वोट दिया। मतदान के दौरान किसी भी देश ने मतदान से परहेज नहीं किया। भारत ने स्पष्ट किया कि किसी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को केवल क्षेत्रीय या उपक्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मामलों से संबंधित प्रथम समिति में सोमवार, 2 नवंबर को इस मसौदा प्रस्ताव पर मतदान हुआ। 'सामान्य और पूर्ण निरस्त्रीकरण: क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर पारंपरिक हथियार नियंत्रण' शीर्षक वाले प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी मिली। हालांकि, यह प्रथम समिति की स्वीकृति है, इसे महासभा के पूर्ण सत्र द्वारा अंतिम रूप से पारित प्रस्ताव नहीं समझा जाना चाहिए।

भारत ने बताया वैश्विक मुद्दा, क्षेत्रीय नियंत्रण पर उठाए सवाल

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनमोल शेर बेदी ने मतदान के बाद भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि पारंपरिक हथियारों का नियंत्रण एक वैश्विक मुद्दा है और इसे मुख्य रूप से क्षेत्रीय या उपक्षेत्रीय व्यवस्था के माध्यम से आगे बढ़ाने के विचार से भारत पूरी तरह सहमत नहीं है।

बेदी ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव के विरोध में भारत का मतदान उसके पहले से चले आ रहे रुख के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि देशों की सुरक्षा जरूरतों और सैन्य परिस्थितियों को केवल किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर निर्धारित करना व्यावहारिक नहीं है।

राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं सीमाओं पर खत्म नहीं होतीं

भारतीय प्रतिनिधि ने प्रस्ताव में क्षेत्रीय सैन्य संतुलन बनाए रखने के विचार पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह का दृष्टिकोण मानकर चलता है कि किसी देश की सुरक्षा चिंताएं उसकी क्षेत्रीय सीमाओं पर समाप्त हो जाती हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

बेदी के अनुसार, सुरक्षा संबंधी चुनौतियां अक्सर निर्धारित क्षेत्रों और उपक्षेत्रों से आगे तक फैली होती हैं। ऐसे में किसी विशेष क्षेत्र के भीतर सैन्य क्षमताओं का संतुलन बनाए रखने की अवधारणा अवास्तविक प्रतीत होती है।

भारत का तर्क है कि हथियार नियंत्रण की किसी भी व्यवस्था में व्यापक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिस्थितियों और संबंधित देशों की वास्तविक सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

पहले से बने दिशा-निर्देशों पर नई चर्चा क्यों?

भारत ने प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण आयोग से क्षेत्रीय हथियार नियंत्रण समझौतों के लिए नए सिद्धांत तैयार करने पर विचार करने के अनुरोध पर भी सवाल उठाए।

अनमोल शेर बेदी ने याद दिलाया कि आयोग इस विषय पर पहले ही तीन महत्वपूर्ण सहमति आधारित दस्तावेज तैयार कर चुका है। इनमें वर्ष 1993 में क्षेत्रीय निरस्त्रीकरण से संबंधित दिशा-निर्देश और सिफारिशें, वर्ष 1999 में पारंपरिक हथियार नियंत्रण तथा निरस्त्रीकरण के दिशा-निर्देश और वर्ष 2017 में पारंपरिक हथियारों से जुड़े विश्वास बहाली उपायों की सिफारिशें शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि जब आयोग इसी विषय पर तीन बार सर्वसम्मति से निष्कर्ष दे चुका है, तो उसी मुद्दे पर फिर से चर्चा कराने की आवश्यकता समझ से परे है। बेदी ने सवाल उठाया कि कहीं इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की निरस्त्रीकरण व्यवस्था को दोबारा उसी प्रक्रिया में व्यस्त रखना तो नहीं है।

दक्षिण एशिया से जुड़े पैराग्राफ का भी विरोध

भारत ने प्रस्ताव के उस विशेष पैराग्राफ के खिलाफ भी अलग से मतदान किया, जिसमें दक्षिण एशिया के संदर्भ में पारंपरिक हथियार नियंत्रण संबंधी प्रस्तावों का उल्लेख था।

इस पैराग्राफ में लैटिन अमेरिकी देशों के बीच हुई चर्चाओं सहित विभिन्न क्षेत्रीय पहलों में विशेष रुचि दिखाई गई थी। साथ ही दक्षिण एशिया में पारंपरिक हथियार नियंत्रण संबंधी प्रस्तावों का भी जिक्र किया गया था।

भारत ने इस हिस्से पर आपत्ति जताकर स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावों को व्यापक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।

प्रस्ताव में हथियारों को न्यूनतम स्तर पर रखने पर जोर

पाकिस्तान और बेलारूस समर्थित प्रस्ताव में कहा गया है कि शीतयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए कई खतरे एक ही क्षेत्र या उपक्षेत्र में स्थित देशों के बीच उत्पन्न हुए हैं। इसलिए पारंपरिक हथियार नियंत्रण को मुख्य रूप से क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

प्रस्ताव में क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हथियारों तथा सैन्य बलों को न्यूनतम संभव स्तर पर बनाए रखने वाले समझौतों को प्रोत्साहित करने की बात कही गई है।

इसके अलावा प्रस्ताव में कहा गया है कि सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण और अधिक सैन्य क्षमता रखने वाले देशों की क्षेत्रीय सुरक्षा समझौतों को बढ़ावा देने में विशेष जिम्मेदारी है।

इस तरह संयुक्त राष्ट्र की प्रथम समिति में भारी समर्थन मिलने के बावजूद भारत ने अपने सुरक्षा हितों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को आधार बनाकर प्रस्ताव का विरोध किया है। भारत का रुख स्पष्ट करता है कि वह पारंपरिक हथियार नियंत्रण को केवल पड़ोसी देशों या किसी सीमित क्षेत्र तक केंद्रित करने के बजाय वैश्विक सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखना चाहता है।