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Explainer: इजराइल चुनाव से भारत को कितना फर्क पड़ेगा? रक्षा सौदों से व्यापार तक समझें पूरा गणित

India Israel Relations: इजराइल चुनाव के बाद भारत के रक्षा सौदों, व्यापार, निवेश और पश्चिम एशिया की रणनीति पर क्या असर पड़ेगा? जानें विशेषज्ञों की राय के साथ पूरा विश्लेषण।
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Sanjana Kumar

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Updated: 29 Oct 2026, 4:00 PM IST

India Israel Relations

India Israel Relations: AI Creative

इजराइल में सत्ता बदली तो भारत पर क्या असर?

India Israel Relations: इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के नतीजे भारत के लिए भी अहम हैं। इसकी वजह सिर्फ प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छे संबंध नहीं, बल्कि रक्षा, तकनीक, व्यापार और पश्चिम एशिया में भारत के हित भी हैं। हालांकि, चुनाव के बाद अभी तक किसी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में सवाल है कि इजराइल में सत्ता का समीकरण बदलता है तो, भारत के साथ रिश्तों पर कितना असर पड़ेगा?

29 अक्टूबर तक उपलब्ध मतगणना के अनुसार, नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को 53 और विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलने का अनुमान था। अरब दलों को मिलाकर 19 सीटें मिलने की संभावना जताई गई। इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 61 का समर्थन जरूरी है। यानी अभी सरकार बनाने के लिए राजनीतिक बातचीत और गठबंधन की भूमिका अहम रहेगी। अंतिम नतीजों और सरकार गठन के बाद ही तस्वीर साफ होगी।

क्या नेतन्याहू की सत्ता जाने से भारत-इजराइल रिश्ते बदल जाएंगे?

भारत और इजराइल के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में रक्षा और तकनीक से आगे बढ़कर कई क्षेत्रों तक पहुंचे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा उपकरणों की खरीद, तकनीक साझा करने, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सहयोग है। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने रिश्तों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' के स्तर पर आगे बढ़ाने की घोषणा की थी।

इजराइल के लेखक और राजनीतिक विश्लेषक एलेक पोलार्ड ने चुनाव से पहले समाचार एजेंसी से कहा था कि चुनाव में कोई भी जीते, भारत और इजराइल के रिश्ते मजबूत बने रहने की संभावना है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि नेतृत्व बदलने पर संबंधों में नया पहलू जुड़ सकता है। नए प्रधानमंत्री और मोदी के बीच तालमेल भी अहम होगा।

इसका मतलब है कि नेतन्याहू की वापसी से मौजूदा राजनीतिक संपर्क बना रह सकता है, जबकि नई सरकार आने पर बातचीत का तरीका और कुछ प्राथमिकताएं बदल सकती हैं। लेकिन सिर्फ नेतृत्व बदलने से सभी पुराने समझौते खत्म हो जाएंगे, ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है।

रक्षा सौदों पर क्यों रहेगी भारत की नजर?

भारत के लिए इजराइल रक्षा उपकरणों और सैन्य तकनीक का अहम स्रोत है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच इजराइल के कुल हथियार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत थी। भारत ने इजराइल से मिसाइल, ड्रोन, रडार और हवाई सुरक्षा से जुड़े कई उपकरण खरीदे हैं।

इन सौदों का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि आधुनिक युद्ध में ड्रोन, सटीक निशाना लगाने वाले हथियार और हवाई सुरक्षा प्रणालियां बड़ी भूमिका निभा रही हैं। भारत के लिए इन उपकरणों की समय पर आपूर्ति, मरम्मत और तकनीक का हस्तांतरण महत्वपूर्ण है।

नई सरकार आने पर रक्षा सहयोग की प्राथमिकताओं और कुछ परियोजनाओं की समयसीमा की समीक्षा हो सकती है। हालांकि, मौजूदा समझौतों में बदलाव या किसी खास सौदे को रद्द करने की पुष्टि के बिना ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी। भारत के लिए असली सवाल यह होगा कि रक्षा जरूरतों के मुताबिक जरूरी उपकरणों की आपूर्ति और तकनीकी सहयोग कितना सुचारु रहता है।

व्यापार और निवेश में क्या बदलेगा?

भारत और इजराइल के बीच आर्थिक संबंधों में भी विस्तार हुआ है। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार 3.93 अरब डॉलर रहा। इसमें भारत का निर्यात 2.23 अरब डॉलर और आयात करीब 1.7 अरब डॉलर था। रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं।

निवेश के मोर्चे पर भी एक अहम कदम उठ चुका है। भारत और इजराइल के बीच सितंबर 2025 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय निवेश समझौता 4 जुलाई 2026 से लागू हो गया। इसका उद्देश्य दोनों देशों के निवेशकों को सुरक्षा देना और निवेश के लिए भरोसेमंद माहौल बनाना है।

वहीं, दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत अभी जारी है। जुलाई 2026 में इस समझौते के लिए दूसरे दौर की बातचीत पूरी हुई थी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि FTA लागू हो चुका है। यदि बातचीत आगे बढ़ती है, तो इससे व्यापार और निवेश के नए अवसर खुल सकते हैं।

भारत के लिए अरब देशों और ईरान से संतुलन क्यों जरूरी?

भारत की पश्चिम एशिया नीति केवल इजराइल तक सीमित नहीं है। खाड़ी देशों के साथ भारत के व्यापार, ऊर्जा जरूरतों और वहां काम करने वाले भारतीयों के हित जुड़े हैं। ईरान के साथ भी भारत के रणनीतिक और क्षेत्रीय हित हैं। इसलिए इजराइल के साथ करीबी संबंध बनाए रखते हुए भारत को अरब देशों और ईरान के साथ अपने रिश्तों का भी ध्यान रखना पड़ता है।

इसी संदर्भ में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) महत्वपूर्ण है। इस परियोजना का उद्देश्य भारत, खाड़ी क्षेत्र और यूरोप के बीच संपर्क तथा व्यापार को बेहतर बनाना है। लेकिन पश्चिम एशिया में युद्ध या तनाव बढ़ने से परिवहन मार्गों, निवेश और क्षेत्रीय सहयोग पर असर पड़ सकता है।

यदि इजराइल में नई सरकार बनती है, तो गाजा, ईरान और पड़ोसी देशों को लेकर उसकी नीतियां भी भारत के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। भारत को अपने रक्षा हितों के साथ ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता का संतुलन बनाए रखना होगा।

अब भारत की नजर किस पर रहनी जरूरी?

इजराइल चुनाव का भारत पर असर समझने के लिए तीन बातें महत्वपूर्ण होंगी। पहली, नई सरकार किस तरह बनती है और उसकी विदेश नीति की प्राथमिकताएं क्या रहती हैं। दूसरी, रक्षा उपकरणों की आपूर्ति और तकनीकी सहयोग पहले की तरह जारी रहता है या नहीं। तीसरी, मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत और पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं कितनी आगे बढ़ती हैं।

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