
ग्लेशियर को लेकर इस्तेमाल की गई प्रतीकात्मक तस्वीर। (फोटो- AI)
पर्वतों से बर्फ और पत्थरों का अचानक ढहना सिर्फ प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि अब हजारों जिंदगियों को निगल जाने वाली त्रासदी साबित हो चुका है। हाल के दिनों में नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर के निचले हिस्से के टूटने से जो तबाही मची, उसने फिर पुरानी घटनाओं की याद दिला दी है।
पुलिस का अनुमान है कि इस आपदा से जान गंवाने वालों का आंकड़ा 270 से ऊपर जा सकता है। जबकि 1000 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। कीचड़ और बर्फ का यह भयंकर सैलाब सड़कों, बिजली परियोजनाओं और गांवों को बहा ले गया।
ग्लेशियर से अब तक की सबसे भयंकर आपदा 1970 में आई है। तब पेरू के युंगाय में 7.9 की तीव्रता वाले भूकंप ने माउंट ह्वास्कारान की उत्तरी दीवार को हिला दिया।
बर्फ और चट्टानों का विशाल ढेर 335 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से युंगाय और रानराहिर्का कस्बों पर टूटा। करीब 25,000 लोग इस आपदा में मारे गए। यह ग्लेशियर से जुड़ी अब तक की सबसे बड़ी तबाही मानी जाती है, जबकि पूरे भूकंप में 50,000 से ज्यादा जानें गईं।
1941 में पेरू के ह्वाराज शहर में ग्लेशियर झील फटने से बाढ़ आई। शहर का एक तिहाई हिस्सा तबाह हो गया और अनुमानित 5,000 लोग मारे गए। यह ग्लेशियर झील फटने की सबसे घातक घटनाओं में शुमार है।
फिर 1962 में उसी पहाड़ से विशाल बर्फ का टुकड़ा टूटा। सात मिनट में 10 मिलियन घन मीटर चट्टान और बर्फ रानराहिर्का गांव पर गिर पड़े। 12 मीटर ऊंची कीचड़ और मलबे ने कई बस्तियों को तबाह कर दिया। इसमें करीब 4,000 लोगों की जान चली गई।
तिब्बत और नेपाल सीमा पर भी पहले ऐसी घटनाएं हुई हैं। 1981 में तिब्बत की 'सिरेनमा को' झील में बर्फ का बड़ा हिस्सा गिरा। जिससे मोरैन बांध टूट गया और 20 मिलियन घन मीटर पानी, बर्फ व मलबा नेपाल की ओर बह निकला। इसमें करीब 200 लोग मारे गए। पुल, सड़कें और जलविद्युत संयंत्र क्षतिग्रस्त हुए। नुकसान करीब 4 मिलियन डॉलर का हुआ।
भारत में साल 2021 में चमोली में बड़ी त्रासदी हुई। नंदा देवी के पास रोंटी चोटी से बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटा। 1500 मीटर नीचे घाटी में चट्टान, धूल और बर्फ का सैलाब फट पड़ा।
इसकी वजह से उत्तराखंड में बाढ़ आई, गांव बह गए, दो जलविद्युत परियोजनाएं तबाह हो गईं और 200 से ज्यादा लोग मारे गए। ये घटनाएं दिखाती हैं कि ग्लेशियर झील फटना, हिमस्खलन या भूकंप से बर्फ का ढहना कितना विनाशकारी हो सकता है।
अब जलवायु बदलाव और पहाड़ी इलाकों में बढ़ते निर्माण ने जोखिम और बढ़ा दिया है। नेपाल-तिब्बत सीमा की ताजा आपदा फिर चेतावनी है कि सतर्कता और बेहतर चेतावनी प्रणालियों की जरूरत है।
Updated on:
27 Aug 2026 04:58 pm
Published on:
27 Aug 2026 04:58 pm
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