
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनई (Photo-IANS)
US-Iran Agreement: अमेरिका और ईरान के बीच समझौते पर सहमति बन गई है। इस पर मिडिल ईस्ट फोरम (MEF) के पॉलिसी एनालिसिस निदेशक माइकल रुबिन की प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि यह समझौता पश्चिम एशिया में एक और बड़े संघर्ष का रास्ता तैयार कर सकता है। इस दौरान उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्था की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
रुबिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए समझौता की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह ईरान को फायदा पहुंचाता है, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मूल मुद्दों का समाधान नहीं करता।
रुबिन ने कहा कि ईरान एक बार फिर समय खरीद रहा है। मुझे कभी नहीं लगा था कि डोनाल्ड ट्रंप, नेविल चेम्बरलेन को भी विंस्टन चर्चिल जैसा दिखा देंगे। ट्रंप जिस समझौते को पेश कर रहे हैं, वह लगभग निश्चित रूप से मध्य पूर्व में एक और संघर्ष की गारंटी देता है।
इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान और करत की मध्यस्थता में भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप न केवल ईरान की बातचीत की रणनीति से प्रभावित हुए हैं, बल्कि उन्होंने पाकिस्तान और कतर जैसे मध्यस्थों का चयन करके भी गलती की है।
उन्होंने कहा कि ईरान समस्या के समाधान के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करना वैसा ही है, जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फ्रैंकलिन रूजवेल्ट नाजी जर्मनी से निपटने के लिए फासीवादी इटली पर भरोसा करते। किसी ऐसे मध्यस्थ पर भरोसा नहीं किया जा सकता जो आपकी हार चाहता हो।
रुबिन ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान पहले भी कई बार अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर चुका है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने तालिबान के मामले में अमेरिका को धोखा दिया, ओसामा बिन लादेन को शरण दी और अब एक बार फिर अमेरिका के हितों के खिलाफ काम कर रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा होर्मुज से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने संबंधी बयान पर रुबिन ने कहा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नेताओं का नहीं, बल्कि जहाज मालिकों का होगा।
उन्होंने कहा कि यदि जहाज मालिकों को सुरक्षा का खतरा महसूस होता है, तो वे ट्रंप के बयान के आधार पर अपने जहाज नहीं भेजेंगे। भारत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर वही चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी जो इस समझौते से पहले थीं।
रुबिन ने यह भी कहा कि भारत की तटस्थ नीति से उसे कुछ लाभ जरूर मिला है, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता अभी खत्म नहीं हुई है।
ईरान के साथ प्रस्तावित समझौते का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं, लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के कई कट्टरपंथी नेता आशंका जता रहे हैं कि ट्रंप ने शांति समझौते के लिए बहुत अधिक रियायतें दे दी हैं। दरअसल, इन नेताओं को डर है कि ट्रंप कहीं 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा किए गए परमाणु समझौते जैसी व्यवस्था को स्वीकार न कर लें।
दक्षिण कैरोलिना से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने समझौते के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उन्हें इस बात की चिंता है कि ईरान द्वारा बताए जा रहे समझौते के विवरण और ट्रंप प्रशासन के दावों में अंतर दिखाई दे रहा है।
मार्क लेविन ने भी समझौते को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने ट्रंप की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने शांति वार्ता के दौरान लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर इजरायल के हमलों की आलोचना की थी।
Updated on:
16 Jun 2026 07:12 am
Published on:
16 Jun 2026 07:12 am
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