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Hijab Row in Iran : फिर याद आ रही वो लड़की जिसके कारण झुका था ईरान

इन दिनों हिजाब भारत से ज्यादा ईरान में चर्चा में बना हुआ है। भारत में हिजाब पहनने का मुद्दा यूनिफॉर्म में इसे शामिल करने को लेकर है जबकि, ईरान में महिलाएं इसकी अनिवार्यता हटाने पर आमादा हैं। 22 साल की अमीनी की मौत से पहले भी ईरान में 2019 में एक महिला की इसी तरह मौत हो गई थी। हालांकि पहले ईरान ऐसा नहीं था। यहां कभी पश्चिमी देशों की तरह खुलापन था। पर 1979 के बाद से 9 साल की उम्र से हर महिला को हिजाब अनिवार्य है, जबकि दुनिया के 55 इस्लामिक देशों में ऐसा कोई नियम नहीं है।

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इन दिनों मॉरल पुलिसिंग के नाम पर एक 22 वर्षीय युवती की मौत से ईरान की अपने देश में जबर्दस्त आलोचना हो रही है। वहीं अब इस मुद्दे पर पूरी दुनिया में उसकी किरकिरी भी हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने इस मामले में जांच की बात कही है। इसके अलावा अमरीका और इटली ने भी इस मामले को लेकर ईरान की आलोचना की है। साथ ही, ईरान में एक और फुटबॉल प्रेमी महिला की शहादत की यादें भी ताजा हो गई हैं, जब उसकी मौत के बाद ईरान सरकार को झुकना पड़ा था।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने जारी किया बयान
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि ईरान में हाल के महीनों में मॉरल पुलिसिंग की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। इसके तहत हिजाब न पहनने के लिए महिलाओं को टारगेट किए जाने के मामले सामने आए हैं। बयान में कहा गया है कि कई वेरिफाईड वीडियोज में हिजाब न पहनने पर महिलाओं को चेहरे पर थप्पड़ मारा जा रहा है। इसके अलावा ढीला हिजाब पहनने पर उन्हें पुलिस की गाड़ी में ठूंस दिया जा रहा है। इटली की विदेश मंत्री ने इसे कायरानापूर्ण कार्य बताया है।

एंटनी ब्लिंकेन ने जारी किया बयान
गौरतलब है कि बीते मंगलवार को 22 साल की महसा अमीनी को गश्ती दल पुलिस थाने लेकर गई थी। तीन दिन के बाद उसकी मौत हो गई। हालांकि ईरानी पुलिस का कहना है कि अमीनी की मौत हार्ट अटैक से हुई थी। वहीं अधिकारियों ने जांच की बात कही है। घटना को लेकर अमरीकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने कहा कि अमीनी को आज जिंदा होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अमरीका और ईरान के लोग आज उनकी मौत पर अफसोस जता रहे हैं। हम ईरान सरकार से कहेंगे कि वह महिलाओं के इस उत्पीड़न को बंद करे।

जब सहर खोडयारी की आत्महत्या से झुकना था ईरान

ईरान में इस तरह का ये कोई पहला मामला नहीं है। 2019 में सहर खोडयारी की आत्महत्या का मामला ईरान के लोगों की यादों में ताजा हो गया है।सहर को ईरान का क़ानून पता था कि खेल के मैदान में महिलाओं का जाना वर्जित है। लेकिन सहर फ़ुटबॉल मैच देखना चाहती थीं। सहर की यह मामूली सी तमन्ना थी जिसे दुनिया की करोड़ों महिलाएं बहुत आसानी से पूरी करती हैं। इसी साल मार्च में सहर की पसंदीदा टीम मैदान में उतरी। ऐसे में उन्होंने पुरुषों की ड्रेस पहनी। ब्लू विग लगाया और लंबा ओवरकोट डाला। इसके बाद वो तेहरान आज़ाद स्टेडियम की तरफ़ बढ़ रही थीं। लेकिन वो कभी स्टेडियम के भीतर नहीं जा पाईं। रास्ते में ही सुरक्षाबलों ने गिरफ़्तार कर लिया। इस जुर्म के लिए सहर को कोर्ट ने समन भेजा और उन्होंने कोर्ट हाउस के बाहर आत्मदाह कर लिया। दो हफ़्ते बाद उन्होंने तेहरान के अस्पताल में दम तोड़ दिया।

सहर की मौत के बाद चला सोशल मीडिया कैंपेन

सहर की मौत के बाद सोशल मीडिया पर ज़ोरदार कैंपेन चलने लगा। ईरान पर दबाव बढ़ने लगा कि वो स्टेडियम में महिलाओं के आने पर लगी पाबंदी ख़त्म हो। इस कैंपेन में ईरान की भी कई महिलाएं शामिल हुईं। सोशल मीडिया पर आम ईरानी सरकार के ख़िलाफ़ खड़े होने लगे। तब ईरान ने वादा किया है कि वो कंबोडिया के साथ होने वाले फ़ुटबॉल मैच में कम से कम 3,500 महिला प्रशंसकों को स्टेडियम में मैच देखने की अनुमति देगा और फिर ईरानी फुटबॉल फ़ेडरेशन ने फ़ीफ़ा से वादा किया कि 10 अक्टूबर को तेहरान आज़ादी स्टेडियम में होने वाले फ़ुटबॉल मैच में ईरानी महिलाओं को आने की अनुमति देगा।

देखते-देखते बिक गए टिकट
महिलाओं को टिकट देने के लिए शुरू में अलग से व्यवस्था की गई थी। ईरना समाचार एजेंसी के अनुसार एक घंटे से कम वक़्त में ही सारे टिकट बिक गए थे। इसके बाद 2022 में वर्ल्ड कप क्वॉर्टर फ़ाइनल मैच के लिए स्टेडियम में महिलाओं के बैठने की व्यवस्था बढ़ाई जा रही है। ईरना का कहना है कि तीन अतिरिक्त लाइनें बैठने के लिए बनाई गई थीं और इन सीटों के टिकट तत्काल ही बिक गए। इसका मतलब ये हुआ कि कम से कम 3,500 ईरानी महिलाएं स्टेडियम मैच देखने आएंगी।

ब्लू गर्ल के नाम से अमर हो गईं सहर

बताया जाता है कि छह माह की सजा की डर से 29 साल की फुटबॉल प्रशंसक सहर खोडयारी ने आत्मदाह कर लिया था, जिसमें वो 90 फ़ीसदी जल गई थीं। सहर को स्टेडियम में घुसने से पहले गिरफ़्तार कर लिया गया था। सहर की मौत के बाद से ईरान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव था कि वो महिलाओं स्टेडियम में आकर मैच देखने की अनुमति दे। सहर को लोग प्यार से 'द ब्लू गर्ल' कहने लगे थे। उनकी पसंदीदा टीम एस्टेगलल फ़ुटबॉल क्लब थी और इसका कलर ब्लू था। इसलिए सहर को लोग प्यार से ब्लू गर्ल कहने लगे थे।

इस्लामिक क्रांति के बाद ही लगे प्रतिबंध

रूढ़िवादी शिया मुस्लिम देश ईरान ने 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद से स्टेडियम में महिलाओं के आने पर पाबंदी लगा दी थी। इस्लामिक धार्मिक नेताओं का तर्क था कि महिलाओं को 'पुरुषवादी माहौल' और 'आधे-अधूरे कपड़े पहने मर्दों' को देखने से बचना चाहिए।ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ईरानी समाज में आधुनिक मूल्यों को लाने का वादा किया था लेकिन वो इस मोर्चे पर लगभग नाकाम रहे। ईरान में महिलाएं आज भी दोयम दर्जे की नागरिक रहने पर मजबूर हैं।

सुधारवादी ईरानी सांसद परवानेह सलाहशौरी ने ट्विटर पर लिखा था, ''जहां महिलाओं की तक़दीर पुरुष तय करते हैं और उन्हें बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित रखते हैं। जहां महिलाएं पुरुषों की निरंकुशता में सहभागी बनती हैं, वहां हम सभी जलकर मरने वाली लड़कियों के लिए ज़िम्मेदार हैं।

गिरफ़्तारी के बाद थीं परेशान, हिजाब नहीं पहनने का था आरोप
ईरान में सहर की मौत के बाद महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक्टिविस्ट काफ़ी सक्रिय हो गए थे, उससे अधिक आक्रोश अब देखा जा रहा है। ईरान की महिलाएं पिछले आठ दशक से चाहे वो पहलवी वंश का शासन रहा हो या इस्लामिक रिपब्लिक, भेदभाव वाले क़ानून से पीड़ित रही हैं। सहर की गिरफ़्तारी के बाद से ही समस्या शुरू हो गई थी। वो ज़मानत पर रिहा थीं। उन पर सार्वजनिक मर्यादा तोड़ने और सुरक्षाबलों को अपमानित करने का आरोप तय किया गया था क्योंकि उन्होंने हिजाब नहीं पहना था।

परेशान सहर ने कर लिया था आत्मदाह

सहर को दो सितंबर को कोर्ट ने समन भेजा था और उनसे कहा गया था कि छह महीने की जेल हो सकती है। ईरान की रोकना न्यूज़ से सहर की बहन ने कहा था कि वो इन सब चीज़ों से परेशान थीं इसलिए ख़ुद को आग के हवाले कर दिया। तब, ओपन स्टेडियम मूवमेंट के दौरान ईरानी महिलाएं खुलकर सामने आईं। सहर की मौत की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छा गई। इसके बाद फ़ीफ़ा भी हरकत में आया। फ़ीफा के चेयरमैन जियानी इन्फ़ैटिनो ने कहा, ''हमारा रुख़ बिल्कुल स्पष्ट है। महिलाओं को स्टेडियम में जाने की अनुमति मिलनी चाहिए।

ईरान में तकनीकी रूप से फ़ेसबुक और ट्विटर प्रतिबंधित

सीआईए वर्ल्ड फ़ैक्टबुक स्टैटिटिक्स के अनुसार ईरान की आठ करोड़ की आबादी में 60 फ़ीसदी लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। ईरान में तकनीकी रूप से फ़ेसबुक और ट्विटर प्रतिबंधित है लेकिन ज़्यादातर युवा प्रतिबंध की उपेक्षा कर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। वॉशिंगटन बेस्ड फ़्रीडम हाउस 2018 की स्टडी के अनुसार ईरान में 60 फ़ीसदी लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में इस आंदोलन को सोशल मीडिया के ज़रिए काफ़ी फैलाया गया।

तब सरकार को झुकना पड़ा था

1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं पर कई तरह की पाबंदी लगा दी गई थी। लेकिन इस बार सरकार को झुकना पड़ा। आयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के शासन में महिलाओं को बाल ढंकने पर मजबूर किया गया और उनसे तलाक़ फाइल करने का हक़ भी वापस ले लिया गया था। टाइट कपड़े पहने को लेकर भी महिलाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया।शराब और संगीत पर भी पाबंदी लगा दी गई। अब यहां की महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें चुनने की आज़ादी दी जाए कि वो इस्लामिक कोड के हिसाब से कपड़े पहनना चाहती हैं या नहीं।

इस्लामिक क्रांति के बाद बदल गया ईरान
दरअसल, ईरान पहले ऐसा नहीं था। ईरान के लोगों में पहले पश्चिमी देशों की तरह खुलापन था लेकिन, 1979 आई इस्लामिक क्रांति ने सबकुछ बदल दिया। शाह मोहम्मद रेजा पहलवी को हटाकर धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमैनी ने सत्ता संभाली और ईरान में शरिया कानून लागू कर दिया। हालांकि यह और बात है कि दुनिया के 195 देशों में से 57 मुस्लिम बहुल हैं। इनमें से 8 में शरिया कानून का सख्ती से पालन किया जाता है। जबकि सिर्फ दो ही देश ऐसे हैं जहां महिलाओं को घर से निकलने पर हिजाब पहनना जरूरी है। इन देशों में ईरान के अलावा अफगानिस्तान भी शामिल है। अफगानिस्तान में इस वक्त तालिबान का शासन है।

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9 साल के बाद हिजाब पहनना अनिवार्य
ईरान में हिजाब की अनिवार्यता को लेकर नियम इतने कड़े हैं कि आप सुनकर ही चौंक जाएंगे। यहां अगर लड़की 9 साल पार कर गई है तो उसके लिए हिजाब पहनना जरूरी हो जाता है। घर से निकलने से लेकर ऑफिस, रेस्तरां, सार्वजनिक स्थल, अस्पताल कुल मिलाकर हर जगह महिलाओं को हिजाब पहनना जरूरी है। इन नियमों का पालन कराने के लिए बाकायदा अलग से पुलिसिंग व्यवस्था भी है, जो सिर्फ शरिया कानून के पालन अच्छे से हो रहे हैं, इन पर नजर रखती है। कोई भी उन्हें ऐसा न करते हुए दिखता है या पता चलता है तो उन्हें उसके खिलाफ सख्त ऐक्शन लेने की पूरी छूट है।

नियम तोड़ने पर 74 चाबुक से लेकर 16 साल तक सजा
ईरान में किसी महिला के लिए हिजाब पहनने के आदेश का पालन करना काफी महंगा और दर्दनाक है। यहां इसे लेकर सख्त कानून है। नियम तोड़ने पर 74 चाबुक लगाने से लेकर 16 साल तक की कैद की सजा दी जाती है। अब अंदाजा लगाइए इतनी सख्ती के बाद भी 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं इस वक्त ईरान में हिजाब पहनने के खिलाफ विरोध में उतर चुकी हैं।