
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Photo/ X@narendramodi)
US sanctions on Iran: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव का असर वैश्विक स्तर पर पड़ रहा है। इस बीच अमेरिका ने ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। अब इन आर्थिक प्रतिबंधों की चपेट में भारत भी आ गया है। दरअसल, अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाते हुए भारत की चार कंपनियों और तीन भारतीय कारोबारियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान की सरकार को आर्थिक चोट पहुंचाना है, ताकि उसकी कमाई के रास्ते बंद किए जा सकें। हालांकि, अमेरिका द्वारा भारतीय कंपनियों और कारोबारियों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
अमेरिका ने जिन चार भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया है, वे हैं-
इसके अलावा, अमेरिका की प्रतिबंधित सूची में तीन भारतीय कारोबारी भी शामिल हैं। इनमें पोर्टईज पार्टनर्स के दो नामित पार्टनर हरीश रामचंद्र रंगी और इंद्रिस्मिया अशरफमिया शेख शामिल हैं। वहीं, पीपी सॉफ्टटेक के प्रशांत गर्ग का नाम भी इस सूची में है।
वाशिंगटन के इन प्रतिबंधों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि ईरान के साथ कारोबार अब सिर्फ अमेरिकी प्रतिबंधों के अनुपालन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि विदेशी बिचौलिए, एजेंट, ब्रोकर, शिपिंग कंपनियां और वित्तीय संस्थान भी इसके दायरे में आ सकते हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका के इन प्रतिबंधों का भारत पर क्या असर होगा। इसे समझने के लिए दोनों देशों के मौजूदा व्यापार को समझना जरूरी है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंधों को काफी कम कर दिया है। 2018-19 में दोनों देशों के बीच करीब 17 अरब डॉलर का सालाना कारोबार था, लेकिन अब इसमें 90 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ गई है। ईरान के साथ भारत के जो कारोबारी संबंध बचे हैं, उनमें भारतीय चाय और चावल का कारोबार अहम है।
2026 के पहले छह महीनों में भारत ने ईरान को लगभग 3,638 करोड़ रुपये का चावल निर्यात किया। इसी अवधि के दौरान भारत ने करीब 136 करोड़ रुपये की चाय ईरान भेजी। ईरान को दवाएं और अन्य सामान भी भेजे गए। इस तरह देखें तो भले ही ईरान का बाजार छोटा हो, लेकिन भारत के लिए यह अहम है। हालांकि, प्रतिबंधों से सबसे बड़ी दिक्कत सामान पहुंचाने के रास्ते और कारोबारियों के बीच भुगतान को लेकर हो सकती है।
भारत का ईरान के साथ अधिकतर कारोबार यूएई के जरिए होता है। भारतीय कारोबारियों को यूएई के जरिए दिरहम या डॉलर में भुगतान मिलता है। ऐसे में अगर ये बैंकिंग और ट्रेडिंग चैनल कमजोर होते हैं तो लेनदेन का पूरा चक्र प्रभावित हो सकता है।
आयात की बात करें तो भारत ने सात साल के लंबे अंतराल के बाद इस साल अप्रैल से ईरान से कच्चे तेल की खरीद फिर शुरू की थी, वह भी अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट मिलने के बाद। 2026 के पहले छह महीनों में भारत ने ईरान से करीब 70.7 करोड़ डॉलर का कच्चा तेल आयात किया। चूंकि अमेरिका ने प्रतिबंधों को फिर सख्त कर दिया है और नए प्रतिबंध लगाए हैं, इसलिए ईरानी तेल की सप्लाई जारी रहना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, यह भारत के लिए बड़ी चिंता की बात नहीं है, क्योंकि वह 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात करता है।
भारत के लिए ईरान सिर्फ तेल का स्रोत नहीं है। चाबहार पोर्ट भारत को पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देने वाली एक रणनीतिक परियोजना है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों का जोखिम पहले ही बढ़ चुका है। अप्रैल 2026 में चाबहार से जुड़ी अमेरिकी प्रतिबंध छूट समाप्त हो चुकी थी, जिससे भारत की इस परियोजना के सामने मुश्किलें बढ़ गई हैं।
अमेरिका की नई आर्थिक घेराबंदी में अगर भारतीय कंपनियों या वित्तीय संस्थानों पर सेकेंडरी प्रतिबंध का खतरा बढ़ता है, तो चाबहार में निवेश और उसके संचालन को लेकर मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
Updated on:
26 Aug 2026 10:03 am
Published on:
26 Aug 2026 10:03 am
