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हाईकोर्ट ने कहा- सीआरपीसी धारा 161 के तहत दर्ज गवाह का बयान है सिर्फ क्रॉस एक्ज़ामिनेशन के लिए

मामले में हाईकोर्ट के जस्टिस ओम प्रकाश त्रिपाठी और जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता ने यह टिप्पणी विशेष न्यायाधीश, बुलंदशहर द्वारा पारित दोषसिद्धि के आदेश और अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302/34 के तहत प्रत्येक पर 10,000/- रुपये के जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ अपीलकर्ताओं द्वारा दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान की है।
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प्रयागराज

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Sumit Yadav

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Updated: 3 Mar 2022, 3:40 PM IST

हाईकोर्ट ने कहा- सीआरपीसी धारा 161 के तहत दर्ज गवाह का बयान है सिर्फ क्रॉस एक्जमीनेशन के लिए

हाईकोर्ट ने कहा- सीआरपीसी धारा 161 के तहत दर्ज गवाह का बयान है सिर्फ क्रॉस एक्जमीनेशन के लिए

प्रयागराज: सीआरपीसी धारा 161 को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले को लेकर हाल ही में कहा कि यह निर्णय की श्रेणी में स्पष्ट है कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह का बयान साक्ष्य के दायरे में आता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सबूत केवल आमने-सामने क्रॉस एक्ज़ामिनेशन के लिए हैं। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह का बयान सबूत में पूरी तरह से अस्वीकार्य होने के कारण इस पर विचार नहीं किया जा सकता है।

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कोर्ट ने कहा कि अपराध के निष्कर्ष पर पहुंचने में ट्रायल कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 की मदद से सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज एक गवाह के बयान पर भरोसा किया। वह इस कार्रवाई से असहमत है। केस पृष्ठभूमि रात में शिकायतकर्ता के पिता को गोली मार दी गई। शिकायतकर्ता अपने पिता के साथ अस्पताल पहुंचा, लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। जांच के बाद अपीलकर्ताओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत आरोप पत्र दायर किया गया। विशेष न्यायाधीश द्वारा अपीलकर्ताओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 302/34 और उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स असामाजिक गतिविधि अधिनियम, 1986 की धारा 2/3 के तहत आरोप तय किए गए और अपीलकर्ता को दोषी ठहराया गया।

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कोर्ट ने आरोपी ने सीआरपीसी की धारा 313 के तहत दर्ज अपने बयानों में कहा कि उन्हें पुरानी दुश्मनी के कारण झूठा फंसाया गया है। अन्य दावों के अलावा, अभियोजन पक्ष गवाह मोहम्मद परवेज के सीआरपीसी की धारा 161 के बयान पर निर्भर है। अधिनियम की धारा 33 की सहायता से भरोसा किया गया, जो यह प्रदान करता है कि एक न्यायिक कार्यवाही में एक गवाह द्वारा दिया गया सबूत बाद की न्यायिक कार्यवाही में साबित करने के उद्देश्य से प्रासंगिक है। कोर्ट ने कहा कि एक ही पक्ष के बीच दो कार्यवाही नहीं है और कोई सवाल ही नहीं कि पहली कार्यवाही में मुद्दे काफी हद तक समान है जैसा कि दूसरी कार्यवाही में है।