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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस बात को लेकर डीजीपी को दिया निर्देश, कहा- साइट मैप तैयार और अपराध स्थल पर न भूले इस काम को करना

खंडपीठ ने मामले सुनवाई करने के साथ निर्देशित करते हुए कहा कि जांच अधिकारी का यह भूमिका होती है कि वह जांच के दौरान सभी पहलू पर गहराई से काम करके रिपोर्ट तैयार करें और सभी तरह की सावधानी भी बरतने के साथ ही हर बिंदु पर पैनी नजर से ध्यान देना जरूरी होता है।
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प्रयागराज

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Sumit Yadav

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Updated: 3 Mar 2022, 10:54 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस बात को लेकर डीजीपी को दिया निर्देश, कहा- साइट मैप तैयार और अपराध स्थल पर न भूले इस काम को करना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किस बात को लेकर डीजीपी को दिया निर्देश, कहा- साइट मैप तैयार और अपराध स्थल पर न भूले इस काम को करना

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को जांच और घटना स्थल पर पहुंचने से पहले मुख्य कार्यों को लेकर निर्देश दिया है। कोर्ट ने जांच अधिकारियों को सही तरीके से साइट मैप तैयार करने के साथ ही घटना स्थल पर स्मार्ट फ़ोन के स्तेमाल से तस्वीर लेने को लेकर निर्देशित किया है। मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की खंडपीठ ने सामूहिक बलात्कार के एक आरोपी की जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया है। विवेचना रिपोर्ट के बाद कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए जांच अधिकारी ने सरसरी तौर पर साइट मैप तैयार किया है। खंडपीठ ने मामले सुनवाई करने के साथ निर्देशित करते हुए कहा कि जांच अधिकारी का यह भूमिका होती है कि वह जांच के दौरान सभी पहलू पर गहराई से काम करके रिपोर्ट तैयार करें और सभी तरह की सावधानी भी बरतने के साथ ही हर बिंदु पर पैनी नजर से ध्यान देना जरूरी होता है।

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कोर्ट ने किया टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए पुलिस महानिदेशक निर्देश देते हुए कहा कि यूपी को जांच अधिकारी द्वारा सही तरीके से सही साइट प्लान/मैप तैयार करने के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने, साइट प्लान के साथ मौके की तस्वीर लेने और साइट प्लान के साथ संलग्न करने के लिए भी सुनिश्चित करें। सभी अधिकारियों के पास स्मार्ट फ़ोन होता है और वह फ़ोन से घटना स्थल की फ़ोटो ले सकते हैं। जमानत आवेदक पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376-D, 377, 506 और नाबालिग से बलात्कार के मामले में पोक्सो अधिनियम की धारा 3/4, 5G के तहत मामला दर्ज किया गया।

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मामले में जमानत याचिका की तरफ से अधिवक्ता ने दलील पेश करते हुए तर्क दिया कि अभियुक्त के परिवार के इशारे पर कहने पर झूठा फसाया गया है। प्रस्तुत किया गया कि पहले अभियोक्ता की बहन ने अन्य ग्रामीणों के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज किया और उसके बाद उसने समझौता कर लिया। जांच अधिकारी द्वारा अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। यह भी तर्क दिया गया कि अभियोक्ता की मेडिकल लीगल रिपोर्ट सामूहिक बलात्कार के आरोपों के संबंध में अभियोक्ता की मौखिक गवाही का समर्थन नहीं करती है। वहीं एजीए ने आवेदक को जमानत देने की प्रार्थना का विरोध किया, लेकिन उन्होंने इस तथ्य पर विवाद नहीं किया कि एफआईआर की सामग्री में विरोधाभास है। पीड़िता का बयान सीआरपीसी की धारा 161 और धारा 164 के तहत दर्ज किया गया है।