वन विभाग, पर्यावरण विशेषज्ञों, गैर सरकारी संगठनों और सरकार के प्रयास जारी हैं, लेकिन इसमें कामयाबी ज्यादा हासिल नहीं हुई है।
रक्तिम तिवारी/अजमेर
बदलते पर्यावरण (environment change) और घटते जंगल (decrease forest) ने जिले को नुकसान पहुंचाया है। जिले से बाघ (tiger) समेत गोडावण (Godavan), गिद्ध, सारस सहित वन्य जीवों (wild animals) की कई प्रजातियां गायब हो चुकी हैं। वन्य जीवों की घटती संख्या वास्तव में चिंताजनक है। अवैध खनन (illegal mining), बढ़ती आबादी (population) और पर्यावरण असंतुलन (ecological imbalance) इसके लिए जिम्मेदार है।
वन्य क्षेत्र में कमी, बढ़ती आबादी, अवैध खनन, पर्यावरण में बदलाव के चलते साल दर साल कई वन्य जीवों की संख्या घटती जा रही है। कई प्रमुख वन्य जीव (wild animals) तो जिले से विलुप्त हो चुके हैं। बचे हुए वन्य जीवों पर भी जबरदस्त खतरा (danger) मंडरा रहा है। वन विभाग (forest dept), पर्यावरण विशेषज्ञों, गैर सरकारी संगठनों और सरकार के प्रयास जारी हैं, लेकिन इसमें कामयाबी ज्यादा हासिल नहीं हुई है।
अब इन्हें देखें सिर्फ तस्वीरों में
बाघ, चिंकारा (chinkara), चीतल (cheetal), सारस, मछुआरा बिल्ली (cat), गिद्ध, उडऩ गिलहरी, काला हरिण (balck deer), जंगली मुर्गा (cock), चौसिंगा (विलुप्त)
जिले में मौजूद वन्य जीव
नीलगाय (रोझड़ा)-3 हजार, लंगूर (langoor)-1 हजार , पैंगोलिन नेवला-200, जंगली ***** (wild pig)-100, मोर-3 हजार, सियार-गीदड़-450
विभाग कराता है प्रतिवर्ष गणना
वन विभाग प्रतिवर्ष वैशाख पूर्णिमा पर वन्य जीवों की गणना (annual census) कराता है। इस बार भी 84 वाटर (water hole) पर गणना कराई थी। विभाग की कराई गणना में कई वन्य जीवों की कई प्रजातियों पर खतरा मंडराया हुआ है।
पांच साल बाद दिखा था पैंथर
इस बार वन विभाग की गणना में पांच साल में पहली बार जिले में पैंथर (panther in ajmer) नजर आया था। ब्यावर के राजगढ़ इलाके में शावक के साथ मादा पैंथर (female panther) भी दिखी थी। कुंडाल में भी पैंथर को चिन्हित किया गया था। जबकि पिछले गणनाओं में पैंथर कभी नहीं चिन्हित हुआ था।