
रेखा बाई कोली (Photo Source - Patrika)
Success Story: करघे की खट-खट के बीच जब रेशम के धागे उलझते हैं, तो सिर्फ चंदेरी साड़ी ही नहीं बनती, बल्कि एक महिला के 40 सालों के संघर्ष और कामयाबी की इबारत बुनी जाती है। प्राणपुर की रेखा बाई कोली की कहानी यही है। गरीबी से शुरू हुआ सफर आज उस मुकाम पर है, जहां वे न सिर्फ परिवार की आर्थिक रीढ़ हैं, बल्कि कई बुनकर परिवारों को रोजगार भी दे रही हैं। इसी जज्बे के लिए मप्र शासन उन्हें राज्य स्तरीय पुरस्कार से नवाज चुका है। साधारण बुनकर परिवार में जन्मीं रेखा का बचपन करघों के बीच गुजरा। विवाह के बाद सीमित आमदनी और चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वे जीवन में आगे बढञना चाहती थी इसलिए उन्होंने पुश्तैनी हुनर को हथियार बनाया और दिन-रात पसीना बहाकर परिवार के बेहतर भविष्य के सपने बुनने शुरू किए।
रेखा ने बुरे दिन भी देखे। कभी परिवार का पेट पालने संघर्ष करने वाली रेखा आज गांव के कई परिवारों को रोजगार दे रही हैं। उनके बच्चे भी अब व्यवसाय से जुडक़र आधुनिक सोच के साथ साडिय़ों को देश भर में पहुंचा रहे हैं। हालांकि अपने सपने पूरे करने के लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की है। जिसका फल उन्हें मिला है।
रेखा ने बाजार की मांग समझी। उन्होंने अशरफी बूटी, शचकरी बूटी, किनार बेल, जाल पल्लू और नक्शी बॉर्डर जैसी पारंपरिक डिजाइनों में रचनात्मकता का ऐसा रंग भरा कि बाजार में साडिय़ों की मांग तेजी से बढऩे लगी। रंगों का अनूठा संयोजन ही उनकी पहचान बन गया। उनके समर्पण और नवाचारों ने 2019-20 में उन्हें मप्र सरकार से राज्य स्तरीय पुरस्कार दिलाया। यह उन रातों की मेहनत का सिला था, जिसने एक गुमनाम बुनकर को पूरे प्रदेश में पहचान दिला दी।
उनका हुनर आज परिचय का मोहताज नहीं है। अब उन्हें बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। पर्यटक और व्यापारी सीधे उनके घर पहुंचते हैं। इस व्यावसायिक सफलता के बावजूद, वे आज भी खुद करघे पर धागे बुनती हैं। उनका जीवन मिसाल है कि महिला ठान ले, तो वह कच्चे धागों से भी समाज के लिए मजबूत भविष्य की डोर बुन सकती है।
Updated on:
23 Oct 2026, 11:19 AM IST
Published on:
23 Oct 2026, 11:19 AM IST
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