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Success Story: पत्नी ने बेचे जेवर, अख्तर ने खड़ा किया बर्तन का कारोबार, आज 2 परिवारों को दे रहे रोजगार

Success Story: 43 साल के अख्तर खान ने पिता की बीमारी के कारण बचपन से कबाड़, कुल्फी बेचने और 10 रुपये दिहाड़ी से शुरुआत कर आज खुद की ऑटो में बर्तन का व्यापार शुरू किया। अख्तर युवाओं के लिए लगन और संतोष की मिसाल बन गए हैं।
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अख्तर खान (Photo Source - Patrika)

अख्तर खान (Photo Source - Patrika)

Success Story: मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। इस कहावत को चरितार्थ किया है मुंगावली निवासी 43 वर्षीय अख्तर खान ने। जो कभी परिवार पालने बेर, पीपल की पत्ती और कबाड़ बेचते थे, आज वे अपनी खुद की ऑटो में बर्तन भरकर साप्ताहिक हाट-बाजारों में जाते हैं और रोजाना अच्छा व्यापार कर रहे हैं। उनकी यह कहानी संघर्ष, समर्पण और संतोष की ऐसी मिसाल है, जिसे हर किसी को जानना चाहिए।

पिता की बीमारी ने बचपन में दी जिम्मेदारियां

अख्तर बताते हैं कि जब उन्होंने होश संभाला, तब से ही उनके जीवन में संघर्ष शुरु हो गया था। 15 साल की उम्र में उन्होंने कुल्फी, आइसक्रीम व कबाड़ बेचने तक का काम किया। उन्होंने 9वीं-10वीं तक पढ़ाई की, लेकिन पिता की तबीयत खराब रहने के कारण पांच भाइयों और चार बहनों के बड़े परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। उस मुश्किल दौर में उन्होंने एक कपड़े की दुकान पर मात्र 10 रुपए रोज की दिहाड़ी पर भी काम किया।

पत्नी ने जेवर बेचकर आसान बनाई राह

अख्तर का हमेशा से सपना था कि वे बर्तन के दुकानदार बनें। महज 2 हजार रुपए से अपने इस व्यापार की शुरुआत की। शुरुआती दिनों में बसों से सफर कर हाट बाजारों तक सामान ले जाते थे, जिससे बस स्टैंड पर सामान की पोटलियां गिरने व बिखरने का डर बना रहता था। उनके इस संघर्ष व मेहनत को देखकर पत्नी ने अपने जेवर बेच दिए, जिससे अख्तर ने खुद की ऑटो खरीदी। आज वे चंदेरी, सेहराई, पिपरई व बहादुरपुर सहित पांच दिन साप्ताहिक हाट करते हैं। इसके अलावा मंगलवार और शुक्रवार को गांवों में जाकर बर्तन बेचते हैं।

दौलत नहीं, सुकून व सम्मान है असली कमाई

अख्तर की खासियत उनका संतोषी स्वभाव है। वे कहते हैं कि करोड़पति नहीं बनना है, ऊपर वाले ने जो दिया है अपनी उस जिंदगी से बेहद खुश व संतुष्ट हैं। आज अच्छा व्यापार जम गया है। वह सिर्फ अपना परिवार ही नहीं पाल रहे, बल्कि दो गरीब युवाओं को भी काम पर रखा है, जिन्हें अच्छा मेहनताना रोज देते हैं व खाना भी खिलाते हैं। वहीं राह चलते किसी गरीब को देखकर उसकी मदद करते हैं, उसे कपड़े व खाना भी देते हैं। उनकी इसी सादगी व व्यवहार के मुरीद पूर्व सांसद केपी यादव भी हैं, जिन्होंने बाजार में अपनी गाड़ी रोककर अख्तर को गले लगा लिया था।

युवाओं के लिए प्रेरणा

मात्र 10 रुपए की दिहाड़ी से शुरुआत करने वाले अख्तर युवाओं के लिए मिसाल हैं कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। उनकी कहानी सिखाती है कि असली सफलता केवल करोड़पति बनने में नहीं, बल्कि अपने काम से संतुष्ट रहने व जरूरतमंदों की मदद करने में है। सच्ची लगन, ईमानदारी व दृढ़ इच्छाशक्ति से जीवन की हर बड़ी मुश्किल को आसानी से पार किया जा सकता है।