
बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में जयपरिसर महावीर धर्मशाला में जयधुरन्धर मुनि ने कहा कि मान अर्थात अहंकार का क्षय होने पर ही क्षमा का गुण प्रकट हो सकता है। उन्होंने कहा कि जिस समय व्यक्ति के अहंकार पर चोट लगती है तो वह क्रोधावेश में आग बबूला बन प्रतिकार करने लग जाता है। प्रतिक्रिया से नहीं, प्रक्रिया से जीवन जीना चाहिए।
मुनि ने कहा कि क्षमा रखना ही हर इंसान का सर्वप्रथम धर्म है। क्षमा को मां की उपमा देते हुए उसे समस्त गुणों की जननी बताया गया है। क्षमा से ही क्रोध को जीता जा सकता है। क्रोध का जवाब क्रोध से देना आग में घी डालने के समान है, जबकि क्रोधी के सामने क्षमा रखना आग में पानी डालने के समान है। जो कार्य क्रोध से नहीं करवाया जा सकता है, वही कार्य क्षमा से सहज ही पूरा हो जाता है।
सभा में ऊषा गोखरु ने 11 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। तपस्वी का सम्मान किया गया। प्रात:कालीन सभा में जयधुरंदर मुनि ने कर्म विज्ञान के बारे में बताते हुए कहा कि दुख कैसे और क्यों उत्पन्न होता है और देने वाला कौन है।
आत्मा का आभूषण है शील: साध्वी दिव्य ज्योति
बेंगलूरु. श्रीरामपुरम जैन स्थानक में साध्वी दिव्य ज्योति ने कहा कि मुक्ति प्रासाद में प्रवेश के चार द्वारों में द्वितीय द्वार 'शीलÓ है। शील आत्मा का आभूषण है। उन्होंने कहा कि नारी को आभूषण बहुत प्रिय होते हैं। इसलिए बहनें शरीर को गहनों से सजाती हंै, लेकिन आभूषण बाह्य शोभा को बढ़ाते हैं तथा यह भी स्थायी नहीं होते, शरीर भी नश्वर है। नश्वर अशाश्वत को सजाने के बजाय आत्मा को सजाओ, क्योंकि आत्मा शाश्वत है।
साध्वी ने कहा कि शील का दूसरा नाम ब्रह्मचर्य है। यह आत्मा का गुण है।
शुद्ध योग से ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले साधक ऋद्धि, सिद्धि तथा लब्धियों का स्वामी बन जाता है। देव, दानव, गंधर्व आदि समस्त देव-देवी भी उनको नमस्कार करते हैं। साध्वी दीप्तिश्री ने कहा कि हमारे जीवन को बनाने के लिए सद्गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु मार्गदर्शक दीपक है। दीपक अंधकार को प्रकाश देता है, वैसे ही गुरु हमारे अज्ञान अंधकार को दूर करते हैं। इसलिए जीवन में गुरु का होना अनिवार्य है।
Published on:
07 Aug 2018 05:38 pm
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