
खेलने-पढ़ने की उम्र में जिंदगी का बोझ उठा रहे सहरिया अंचल के बच्चे (फोटो-एआई)
-हुकमदत्त भार्गव
शाहाबाद (बारां): दादा की उंगली थामे 10 साल की प्रियंका जब चलती है तो उसके साथ उसकी उम्र से कहीं बड़ा दर्द भी चलता है। पिता को खोने के बाद मां भी उससे दूर हो गई। अब उसके जीवन में अगर कोई अपना है तो वह 65 वर्षीय दादा हैं। प्रियंका के लिए वही मां हैं, वही पिता और वही पूरा परिवार।
करीब चार साल पहले पत्थर की खान में डूबने से प्रियंका के पिता की मौत हो गई थी। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता की मौत के करीब एक महीने बाद मां ने भी दूसरी जगह विवाह कर लिया। मां के जाने के बाद प्रियंका दादा के पास रह गई। उम्र के इस पड़ाव पर जब दादा को खुद सहारे की जरूरत है, वे पोती की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।
दादा अपनी क्षमता के अनुसार उसकी जरूरतें पूरी करते हैं और पढ़ाई जारी रखने की कोशिश करते हैं। मगर प्रियंका के मन में भविष्य को लेकर एक डर है। वह शायद इसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती।
प्रियंका की कहानी अकेली नहीं है। किशनगंज-शाहाबाद के सहरिया अंचल में कई बच्चे ऐसे ही सवालों के बीच गुजर रहे हैं। किसी ने पिता को खो दिया तो किसी के सिर से मां का आंचल उठ गया। कोई बुजुर्ग दादा-दादी की छांव में पल रहा है तो किसी की बड़ी बहन ने छोटे भाई-बहनों के लिए अपना घर तक छोड़ दिया।
शाहाबाद की सहरिया बस्ती में 12 वर्षीय सरस्वती भी दादा-दादी के सहारे है। पिता की मौत के बाद मां दूसरी जगह चली गई। दोनों बच्चों की जिम्मेदारी करीब 70 वर्ष के दादा-दादी पर आ गई। उम्र और बीमारी के बावजूद बुजुर्ग दोनों बच्चों को अकेला नहीं छोड़ रहे। बच्चों के लिए अब यही दादा-दादी उनके मां-बाप हैं। घर की छोटी-बड़ी जरूरतों के बीच बुजुर्गों की अपनी परेशानियां पीछे छूट गई हैं।
राज और उसकी 14 वर्षीय बहन सोमबाई की कहानी रिश्तों की मजबूती और त्याग की मिसाल है। पिता की मृत्यु के बाद दोनों बच्चों की जिम्मेदारी बड़ी बहन शकुंतला ने संभाली। शकुंतला विवाहित है और उसका ससुराल पाटन गांव में है, लेकिन छोटे भाई-बहनों को अकेला छोड़ना उसे मंजूर नहीं था। वह अपना ससुराल छोड़कर दोनों के साथ रहने लगी। जिस उम्र में उसे अपना वैवाहिक जीवन संवारना था, उस उम्र में वह भाई-बहनों का भविष्य संवारने में जुट गई।
इन बच्चों की सबसे बड़ी चिंता केवल परिवार का बिखरना नहीं है, बल्कि बचपन का धीरे-धीरे हाथ से निकल जाना है। जिस उम्र में हाथों में किताब, कॉपी और खिलौने होने चाहिए, उसी उम्र में कई बच्चे घर की जिम्मेदारियों और मजदूरी में उलझ जाते हैं। परिवार में कमाने वाला नहीं होने पर दो वक्त की जरूरतें पूरी करना प्राथमिकता बन जाती है। ऐसे में पढ़ाई पीछे छूटने लगती है। बच्चे परिस्थितियों से लड़ते हुए समय से पहले बड़े होने लगते हैं।
आदिवासी अंचल में नाता प्रथा से जुड़ी परिस्थितियों में भी कई बार बच्चों का भविष्य प्रभावित होता है। पिता की मौत के बाद मां दूसरी जगह विवाह कर ले तो बच्चे पीछे छूट जाते हैं। कोई दादा-दादी या रिश्तेदार संभाल ले तो जिंदगी किसी तरह आगे बढ़ती है, लेकिन सहारा नहीं मिलने पर बच्चों के सामने भोजन, रहने और शिक्षा तक का संकट खड़ा हो जाता है।
ऐसे बच्चों के लिए पालनहार योजना संचालित है। योजना में 0 से 6 वर्ष तक के बच्चे के लिए 750 रुपए और 6 से 18 वर्ष तक के बच्चे के लिए 1,500 रुपए प्रतिमाह दिए जाते हैं। इसके लिए बच्चे का स्कूल में अध्ययनरत होना आवश्यक है। पात्र बच्चों को योजना का लाभ दिलाने के लिए विभागीय स्तर पर प्रक्रिया की जाती है।
-शुभम नागर, जिला समाज कल्याण अधिकारी
Updated on:
05 Oct 2026 04:53 pm
Published on:
05 Oct 2026 04:53 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
