उन्होंने कहा कि चाहे हिंदू कथावाचक हों, मुस्लिम जलसों में भाषण देने वाले मौलवी हों, या फिर शायर हों, ये तीनों तरह के लोग पेशेवर (प्रोफेशनल) हैं। ये बिना पैसे तय किए किसी कार्यक्रम में नहीं जाते। इन लोगों ने अपनी निजी सुरक्षा रखी है, जो उनका पैसा तय करता है। इसके बाद ही उन्हें कार्यक्रम की तारीख मिलती है। ये पहले पैसे लेते हैं।