बीती जा रही है जिंदगी दरी-फट्टा उठाते-उठाते
बड़े नेता आएं तो भीड़ हम जुटाएं, पोस्टर-बैनर, झंडा लगाएं, दरी-फट्टा उठाते-उठाते बीती जा रही जिंदगी। काकाजी ठीकई कहते थे पढ़-लिख लो, नेतागिरी ते जीवन ना चलै। अब घर वाले भी खरी-खोटी सुना रएं। दशकों से बतौर राजनीतिक दलों के कर्मठ कार्यकर्ता सेवाएं दे रहे लोगों के घरों पर चुनाव अभियान से जुडऩे का बुलावा आ रहा है। ऐसे में घर वाले उन्हें खूब खरी खोटी सुना रहे हैं। परिवार के लोगों का कहना होता है कि राजनीति से रोजी-रोटी नहीं चलती। बच्चों की स्कूल की फीस का इंतजाम नहीं होता। ऐसी राजनीति किस काम की है।