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स्वतंत्रता दिवस: अंग्रेजों की CID तलाशती रही पर्चे, मैं बनियान में लपेटकर पैरावट में छुपा आया, संस्मरण क्रांतिकारी हीरालाल की जुबानी

हीरालाल सोनबोइर एकमात्र शख्स हैं जो स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रपति पुरस्कत शिक्षक और विधायक भी रहे। आजादी की 72 वीं वर्षगांठ पर डायरी में लिखे स्वतंत्रता आंदोलन का संस्मरण उन्हीं के जुबानी—
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भिलाई

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Dakshi Sahu

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Updated: 15 Aug 2018, 10:45 AM IST

PATRIKA

स्वतंत्रता दिवस: अंग्रेज की सीआईडी तलाशती रही पर्चे, मैं बनियान में लपेटकर पैरावट में छुपा आया, संस्मरण क्रांतिकारी हीरालाल की जुबानी

निर्मल साहू@भिलाई/बालोद. डौंडीलोहारा से राजनांदगांव रोड पर पूर्व दिशा की ओर करीब तीन किमी की दूरी पर एक छोटा सा गांव है भरदा। यहां के एक सामान्य किसान घनाराम साहू-ग्वालिन बाई के घर 1 जनवरी 1907 को एक बच्चे का जन्म हुआ। अत्यंत गौरवर्ण के इस बालक को देखकर पड़ोस में रहने वाले भैरा केंवट ने कहा तोर बेटा तो हीरा सही चमकत हे।

संस्मरण उन्हीं की जुबानी
ऐसा बोलकर उसने बच्चे का नामकरण ही कर दिया। माता-पिता ने नाम रखा हीरालाल। हीरालाल सोनबोइर एकमात्र शख्स हैं जो स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रपति पुरस्कत शिक्षक और विधायक भी रहे। आजादी की 72 वीं वर्षगांठ पर डायरी में लिखे स्वतंत्रता आंदोलन का संस्मरण उन्हीं के जुबानी—

सात-आठ साल की उम्र में मैंने गांव में नारा सुना कपड़ा पहनो खादी के, जय बोलो महात्मा गांधाी के। इस नारे से मेरे मन में गांधी जी के प्रति श्रद्धा का भाव उदय हुआ। तभी से दिल में स्वतंत्रता की चिंगारी सुलग उठी थी। 1924 में प्राथमिक शाला सोरर और फिर 1928 में अरजुंदा मिडिल स्कूल में शिक्षक बना।

गांव वाले चौपाल में जमा हो जाते
सप्ताह में चार दिन छुट्टी के बाद बच्चों और शिक्षकों को साथ लेकर जनजागरण करने कांदुल, परसतरई, मनकी, मटिया आदि गांव जाते थे। जुलूस में तिरंगा लेकर चलते थे और अंगे्रजी सत्ता के खिलाफत नारे लगाते थे। गांववाले चौपाल में जमा हो जाते और फिर हम लोग भाषण देते थे।

मुझे पहले भाषण देने में कंपकंपी होती थी, हालांकि बाद में निर्भयता आती गई। हम तीन लोगों मुझे, उमेंद सिंह कलिहारी और छोटेलाल को जुलूस निकालता देख उस समय अरजुंदा के मालगुजार शिवचरण चंद्राकर उपहास उड़ाते थे कि ये तीनों तेली ह स्वराज लाही।

स्वतंत्रता की वो पहली सुबह
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति की घोषणा हुई। तब मैं डौंडीलोहरा में पदस्थ था। मन्नाराम पंाडेय जो उस समय दीवान थे, चंद्रिका प्रसाद पांडेय और पंडित राधेश्याम शर्मा की उपस्थिति में गांववालों की बैठक हुई और आजादी का जश्र जोदार मनाने का निर्णय लिया। गांव में तत्काल विजय चबूतरा बनवाया। सुबह बच्चों का जुलूस निकाला। हर तरफ उल्लास और उमंग था। जमीदारों ने बच्चों को पेंट- शर्ट दिया। गरीबों को भोजन खिलाया और वस्त्र बांटे।

खैर हम लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता था। जिस समय मैं पैरी (सिकोसा) के स्कूल में था मेरा काम अंग्रेजों के खिलाफ पर्चा बांटना था। साथ में डाक खाने का भी काम देखता था। अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे को डाक के डिब्बे में छुपाकर रखता था। पर्चा काफी भड़काने वाला होता था। जिसमें रेलपांत उखाडऩे, डाकघर जलाने, टेलीफोन के खंभे उखाडऩे का आह्वान होता था।

पैरावट में छुपा दिया
मेरे पर्चा बांटने की भनक अंग्रेजों को लग गई। जांच के लिए सीआइडी हवलदार को पैरी भेजा। वह पूरे दिन मेरे साथ रहा। लेकिन मैंने भी चालाकी से पर्चा बनियान में लपेटकर पैरी के किसान रामप्रसाद को दे दिया और उन्होंने पैरावट में छुपा दिया। हालांकि सीआईडी को पर्चा नहीं मिला, लेकिन उन्हें यकीन तो हो ही गया था कि मैं अंग्रेजों का खिलाफत करने पर्चा बांटता हंू।

बाद में लाटाबोड़ के पटवारी मोहम्मद हुसैन आए। उन्होंने राज खोलते हुए बताया कि सीआईडी और मुझे दोनों को आदेश है कि कैसे भी आपसे पर्चा हासिल करें। इसके बाद अरजुंदा थाने के थानेदार किदवई आए। उन्होंने कहा कि केवल एक पर्चा दे दें, आपके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं होगी। मैंने भी कह दिया कि पर्चा तो बंट चुुका है। आप लोगों से प्राप्त कर लें। मेरी इस स्वीकारोक्ति के बाद मैं अंग्रेजों की नजर में चढ़ चुका था। नतीजा कई बार बर्खास्तगी और जेल यात्रा रही।

1961 में उप राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने मुझे उत्कृष्ट शिक्षक के पुरस्कार से नवाजा। पुरस्कर लेकर लौटने पर ग्राम लाटाबोड़ में मेरा भव्य स्वागत हुआ। यह मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षण रहा। 60 साल की उम्र में कांग्रेस ने मुझे बालोद विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया और में विधायक चुन लिया गया। 1967, 1972 और 1980 में तीन बार में विधायक रहे। 90 वर्ष की उम्र में 16 अप्रैल 1997 को अंतिम सांस ली।