
भोपाल। मप्र उर्दू अकादमी की ओर से मशहूर शायर और गीतकार असद भोपाली के शताब्दी वर्ष पर स्मृति समारोह 'प्यार बांटते चलो' का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लेखक और शायर प्रो. अतीकुल्लाह ने कहा कि हमें असद भोपाली और उन सभी शायरों को याद करने की जरुरत है जिन्होंने भोपाल के मानसिक व सांस्कृतिक इतिहास को संग्रहित किया। जिन्होंने इस भोपाल को हिन्दुस्तान के नक्शे में केंद्र बनाने का प्रयास किया।
फिल्मी गीतों में भी शायरी की कसौटी को कायम रखा
मुख्य अतिथि फिल्म लेखक व निर्देशक रूमी जाफरी ने कहा कि आजादी के बाद फिल्म इंडस्ट्री में उर्दू साहित्य के जो शायर थे और जिन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में भी उर्दू साहित्य के विकास का काम किया। उनमें मजरुह सुल्तानपुरी, साहिर, राजा मेहदी अली, कैफी आजमी, अली सरदार जाफरी इत्यादि शामिल है। यह सूची असद भोपाली के बगैर पूरी नहीं होती। असद भोपाली ने फिल्मी गीतों में भी शायरी की कसौटी को कायम रखा। उनकी जिस खूबी ने मुझे प्रभावित किया वो यह है कि उन्होंने सबसे ज्यादा म्यूजिक डायरेक्टर्स को ब्रेक दिलवाया। आम तौर पर यह होता है कि म्यूजिक डायरेक्टर्स, गीतकारों को ब्रेक दिलाते हैं मगर असद भोपाली ने इसके विपरीत म्यूजिक डायरेक्टर्स को ब्रेक दिलवाया।
असद भोपाली एक प्राकृतिक शायर थे
रशीद अंजुम ने कहा कि असद भोपाली ने 1949 से लेकर 1989 तक 142 फिल्मों में लगभग 400 गाने लिखे। उनका लिखा हर गाना पूरी तरह उर्दू शायरी की कसौटी पर पूरा उतरता है। उन्होंने ने लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत के साथ जो गीत लिखा वो आज भी याद किया जाता है। उस गाने के बोल हंसता हुआ नूरानी चहरा, काली जुल्फें रंग सुनहरा... आज भी हर जुबा पर है। वहीं, परवेज अख्तर ने कहा कि प्रारंभिक रूप से वे एक प्राकृतिक शायर थे। उन्होंने जिस जमाने में होश संभाला वो दौर राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन का दौर था। इसका प्रभाव उस समय के युवाओं पर भी पड़ा मगर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई। इसके साथ उनका शायरी का सफर भी जारी रहा और वो मुशायरों में हिस्सा लेने लगे।
Published on:
13 Sept 2021 11:53 pm
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