
madhyapradesh-mahamukabla-2019
अरुण तिवारी, भोपाल. भाजपा के बुजुर्ग नेता इन दिनों नाराज दिख रहे हैं। उनको सहमति के बिना घर बैठाकर रिटायर किया जा रहा है। लोकसभा चुनाव के वक्त उनकी नाराजगी से भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। भाजपा से बाहर गए एक बुजुर्ग नेता कहते हैं कि दिल्ली की तरह प्रदेश में भी वरिष्ठ नेता धीरे-धीरे किनारे कर दिए गए हैं। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के चुनाव नहीं लडऩे के फैसले ने प्रदेश में नई बहस छेड़ दी है। सांसद ज्ञान सिंह और बोध सिंह भगत की भी विदाई की टिकट कट गई। कभी भाजपा में खास रहे रामकृष्ण कुसमरिया कहते हैं कि बेआबरु होकर मजबूरी में पार्टी छोडऩी पड़ी। भाजपा ने सुमित्रा के साथ भी ठीक नहीं किया कि उन्हें मजबूरी में चि_ी लिखनी पड़ी। सरताज सिंह ने कहा कि वरिष्ठ नेताओं की सम्मानजनक विदाई हो सकती थी। इस मामले में 'पत्रिकाÓ ने कुछ नाराज नेताओं से बात की।
- भाजपा से ये नेता नाखुश
सुमित्रा महाजन : इंदौर से आठ बार की सांसद सुमित्रा महाजन ने पत्र लिखकर चुनाव लडऩे से मना कर दिया। उनके पत्र से वजह भी जाहिर हो गई। उन्होंने लिखा कि टिकट के फैसले में देरी हो रही थी, इसलिए मैंने चुनाव न लडऩे का निर्णय कर पार्टी को चिंतामुक्त कर दिया।
ज्ञान सिंह : भाजपा ने शहडोल सांसद ज्ञान सिंह का टिकट काटकर कांग्रेस से आईं हिमाद्री सिंह को दे दिया। ज्ञान ने 'पत्रिकाÓ से कहा कि वे गरीब थे, इसलिए उनका टिकट काट दिया गया। लोकसभा उपचुनाव में जिस हिमाद्री को उन्होंने हराया था, उसी की वजह से वे टिकट की लड़ाई हार गए।
बोधसिंह भगत : टिकट कटने से नाराज बोधसिंह ने निर्दलीय नामांकन भर दिया है। भगत ने कहा कि गौरीशंकर बिसेन की वजह से उनका टिकट काटा गया है, नकली खाद, बीज का विरोध करना क्या गुनाह है। उन्होंने जितने काम किए हैं, उतने बिसेन ने भी नहीं किए।
बाबूलाल गौर : पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के रिश्ते भी पार्टी से मधुर नहीं रहे। 75 पार के फॉर्मूले का हवाला देकर अचानक मंत्री पद से हटाए गए। जबकि, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि ऐसा कोई फॉर्मूला नहीं है। विधानसभा चुनाव में गौर के मुखर विरोध के बाद उनकी बहू कृष्णा गौर को टिकट मिल पाया। गौर ने लोकसभा चुनाव के लिए भी टिकट मांगा है।
सरताज सिंह : 75 के फॉर्मूले के तहत विधानसभा का टिकट कटा तो सरताज ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। सरताज कहते हैं कि वे मजबूरी में भाजपा छोड़कर गए। जब 75 पार का फॉर्मूला नहीं था तो टिकट क्यों काटा। उनके साथ छल-कपट किया गया। ऐसा रवैया न अपनाकर निवेदन किया होता तो खुद सीट छोड़ देते।
रामकृष्ण कुसमरिया : पांच बार के सांसद और चार बार के विधायक रामकृष्ण कुसमरिया कहते हैं कि भाजपा ने उनकी कद्र नहीं की, नहीं तो इस तरह बेआबरु होकर जाना नहीं पड़ता। पार्टी टिकट देने का कहती रही और आखिरी में न देने की जिद पकड़ ली।
कुसुम सिंह मेहदेले : वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री कुसुम मेहदेले का भी विधानसभा का टिकट काट दिया था। नाराज मेहदेले ने कहा कि खजुराहो से टिकट दो या फिर राज्यपाल बनाओ। मेहदेले ने ट्वीट के जरिए भी कई बार अपनी नाराजगी जताई।
** कांग्रेस में ये नेता प्रमुख पदों पर
कांग्रेस में इस तरह का कोई फॉर्मूला नहीं है। 70 पार दिग्विजय सिंह चुनाव लड़ रहे हैं तो कमलनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। इनके अलावा संगठन में भी कुछ वरिष्ठ नेता महत्त्वपूर्ण पदों पर हैं।
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किराए की साइकिल से प्रचार करने जाते थे कार्यकर्ता
- गेरू या नील से करते थे दीवार लेखन
सैमुअल दास, शिवपुरी. बात 1951 की है। चुनाव में उतरे प्रत्याशी प्रचार के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को किराए की साइकिल दिलवाते थे। कार्यकर्ता इन साइकिलों से गांव-गांव जाकर माहौल बनाते थे। वे अपने साथ गेरू या नील का डिब्बा भी रखते थे, जिससे दीवारों पर प्रत्याशी को वोट देने की अपील लिखते थे। उस समय चुनाव बहुत कम खर्च में हो जाता था।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 92 वर्षीय प्रेमनारायण नागर ने बताया कि आजाद भारत में पहला चुनाव 1951 में हुआ, तब कांगे्रस का चुनाव चिन्ह दो बैल की जोड़ी), हिंदू सभा का चुनाव चिन्ह घुड़सवार और कम्यूनिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह हसिया-हथौड़ा था। तब हिंदू सभा के वीजी देशपांडे ने ग्वालियर व गुना दो सीटों से चुनाव लड़े और जीत हासिल की। कांग्रेस को लगा कि गुना सीट पर हिंदू सभा का कब्जा हो जाएगा तो फिर 1957 में कांग्रेस ने विजयाराजे सिंधिया को चुनाव मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दर्ज कराई। नागर बताते हैं कि 1962 में जीवाजीराव सिंधिया की मृत्यु हो गई तो विजयराजे ग्वालियर से चुनाव जीतीं। उस समय लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ हुआ करते थे और वोटर को दोनों प्रत्याशियों को वोट देने पड़ते थे। सन् 1967 में कांग्रेस में अंदरूनी कलह हुई, क्योंकि विजयराजे ने आठ-दस टिकट मांगे थे, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा ने टिकट नहीं दिए तो विजयराजे ने कांग्रेस छोड़कर स्वतंत्र पार्टी ज्वॉइन कर ली। वे गुना से लोकसभा व करैरा से विधानसभा चुनाव लड़ीं और दोनों चुनाव जीतीं।
- गुड़ चना साथ लेकर चलते थे
बकौल नागर, उस समय प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए कार्यकर्ता को 10-12 दिन के लिए किराए की साइकिल दिलवाते थे। कार्यकर्ता गुड़-चना साथ लेकर जाता था। साइकिल से वो एक दिन में एक गांव पहुंचता था और वहां चौपाल पर बैठकर प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाता। अगले दिन सुबह उस गांव की दीवार पर प्रत्याशी का नाम लिखकर वोट देने की अपील करके अगले गांव की ओर रवाना हो जाता था। रास्ते में भूख लगती तो वो गुड़-चना खा लेता था।
- मतपेटी पर रहता था चुनाव चिन्ह
नागर ने बताया कि उन दिनों मतपेटियों पर संबंधित पार्टी का चुनाव चिह्न भी चिपका रहता था। पेटी पर वोटर की भीड़ से चुनाव परिणाम का अंदाजा लग जाता था। कई वोटर नासमझी में मतपेटी के ऊपर ही अपनी पर्ची रख जाते थे, जिसे नजर बचाकर कई बार दूसरे दल के लोग उन पर्चियों को अपने प्रत्याशी की पेटियों में डाल लेते थे। बाद में पर्चियों की गिनती होती थी।
- 1967 से महंगा हुआ चुनाव
उन्होंने बताया कि सन् 196 7 के बाद से चुनाव महंगा हो गया, क्योंकि उस समय में चुनाव प्रचार के लिए जीपें आ गई थीं और पार्टियों द्वारा अपने प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए कार्यकर्ताओं को जीप में भरकर संसदीय क्षेत्र में पहुंचाया जाता था। एक बार जब जीप से कोई कार्यकर्ता प्रचार कर लेता था तो फिर वो साइकिल से नहीं जाता था। उसके बाद से चुनाव महंगा होता गया और प्रचार-प्रसार के आधुनिक संसाधनों पर प्रत्याशी का खर्चा बढ़ गया।
Published on:
15 Apr 2019 05:16 am
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