
congress big strategy
भोपाल. प्रदेश की सत्ता से बाहर होने के बाद भाजपा छोडकऱ कांग्रेस में जाने वाले नेताओं को रोकने और डैमेज कंट्रोल के बड़े-बड़े दावे पार्टी नेताओं ने किए, लेकिन पार्टी छोडऩे वालों का दर्द यही है कि संगठन पदाधिकारियों ने उन्हें रोकना तो दूर, कभी फोन पर बात करना भी गवारा नहीं समझा।
अधिकांश का कहना है कि प्रयास होते तो पार्टी छोडऩे की नौबत नहीं आती। चार महीने में इसके एक दर्जन से ज्यादा नेताओं ने पार्टी छोड़ी। ऐसे में भाजपा की डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
शिवराज ने 13 साल पहले फोन पर बात की थी : पटेरिया
भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे धीरज पटेरिया विधानसभा चुनाव में बागी उतरे थे। पटेरिया का कहना है कि भाजपा में अपने नेताओं की कितनी कद्र है, इसका आप इसी से अंदाज लगा लीजिए कि
शिवराज सिंह चौहान ने मुझसे आखिरी बार 5 जुलाई 2006 को फोन लगा कर बात की थी और कांग्रेस में आया हूं तो यहां 8 दिन में सीएम कमलनाथ ने चार बार मुझसे फोन पर बात की है। जब मैंने खुद संगठन मंत्री सुहास भगत और संघ पदाधिकारियों को फोन कर कांग्रेस में जाने की सूचना दी, तो उन्होंने इतना कहा, कांग्रेस में मत जाओ, सब अच्छा हो जाएगा।
शिवराज और तोमर निकट भविष्य के आडवाणी: राकेश
2013 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में पहुंचे चौधरी राकेश ङ्क्षसह चतुर्वेदी ने पिछले दिनों कांग्रेस मेंं वापसी कर ली। राकेश सिंह का कहना है कि बड़ा निर्णय लेने के बाद भी न तो भाजपा ने उन्हें रोकने की कोई कोशिश की और न ही उनके नेताओं की तरफ से ऐसे कोई फोन आए।
चौधरी राकेश ने आरोप लगाया कि भाजपा के प्रदेश के नेता अपनी पार्टी के नाराज और दुखी लोगों को रोकने की क्षमता भी नहीं रखते हैं, वो तो सिर्फ कठपुतलिया हैं। उन्होंने कहा, शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर निकट भविष्य के आडवाणी हैं।
वहां कोई काम नहीं था, यहां चुनाव में अतिव्यस्त हूं : पटेल
पूर्व विधायक निशीथ पटेल का कहना है कि मेरे भाजपा छोड़ कांग्रेस में जाने की खबर पहले से सभी को थी, लेकिन पहले किसी ने न तो मिलने का प्रयास किया न ही फोन लगाकर उन्हें मनाने-समझाने की कोशिश की।
जिस दिन भाजपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली उस दिन कई नेताओं ने बात करके महज औपचारिक तौर पर रोकने की कोशिश की। पटेल नाराजगी जताते हुए कहते हैं, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और प्रदेश अध्यक्ष राकेश ङ्क्षसह ने तब बात की जब मैंने भाजपा छोड़ दी, यह डैमेज कंट्रोल का कौन सा तरीका है।
विरोधियों से ज्यादा भीतरघातियों का खतरा
लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया, भाजपा के फग्गन सिंह कुलस्ते और नंदकुमार ङ्क्षसह चौहान अगर इस बार चुनाव जीतते हैं ये छठवीं बार लोकसभा तक पहुंचेंगे। इन्हें रोकने के लिए विरोधियों ने ताकत झोंक दी है। रतलाम में भूरिया के सामने भाजपा के जीएस डामोर हैं। खण्डवा में भाजपा और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों के आमने-सामने होने से यहां का मुकाबला रोचक है।
नंदकुमार चौहान यहां पांच बार चुनाव जीते। अरुण यादव ने वर्ष 2009 के चुनाव में इनसे यह सीट छीन ली थी। वर्ष 2014 के चुनाव में चौहान ने हार का बदला ले लिया। 29 अप्रेल को मतदान में मण्डला से किस्मत आजमा रहे फग्गन सिंह कुलस्ते का भाग्य ईवीएम में कैद हो गया है। ये भी छठी बार संसद जाने की इच्छा रखते हैं। भाजपा सांसद गणेश सिंह चौथी बार मैदान में हैं।
टिकट मिलने के साथ ही इनका विरोध है। भितरघात का भी डर है। सांसद भाजपा अध्यक्ष राकेश ङ्क्षसह चौथी बार संसद तक पहुंचने की तैयारी में हैं। इन्हें राज्यसभा सदस्य विवेक तनखा कड़ी टक्कर दे रहे हैं। ग्वालियर छोडकऱ मुरैना से चुनाव लड़ रहे केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के तीसरी बार चुनाव जीतने में कांग्रेस के रामनिवास रावत चुनौती बने हैं। विरोधी भी सक्रिय हैं।
कई बार जब लोगों को टिकट नहीं मिलता तो वे पार्टी की सीमा लांघ जाते हैं। ऐसे में समझाने के अलावा संगठन और नेतृत्व के पास कोई उपाय नहीं रहता है। पार्टी ने उन सभी लोगों को समझाने की कोशिश की है, जो दूसरे दल में गए हैं। यह आरोप ठीक नहीं है कि हमने पार्टी छोडऩे वालों को नहीं समझाया।
- डॉ. दीपक विजयवर्गीय, मुख्य प्रवक्ता भाजपा
Updated on:
05 May 2019 09:36 am
Published on:
05 May 2019 09:36 am
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