
वायु प्रदूषण का नया पैटर्न आया सामने, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)
सुनील मिश्रा की रिपोर्ट…
Bhopal news:मध्यप्रदेश में कार्बन डाई ऑक्साइड के बाद मीथेन गैस हवा को सबसे ज्यादा प्रदूषित कर रही है। सैटेलाइट विश्लेषण में राज्य में चार अलग-अलग प्रदूषण क्षेत्रों की पहचान की गई है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में उद्योग परिवहन प्रमुख स्रोत हैं। सिंगरौली कोयला खनन से होने वाला मीथेन उत्सर्जन ज्यादा है।
सागर, मुरैना, व में रीवा, खरगोन और छिंदवाड़ा सहित अन्य जिलों में पशुधन से होने वाला मीथेन उत्सर्जन ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बायोमास जलाने से ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन हो रहा है। इन प्रदूषकों के चलते 2030 के दशक तक मप्र के औसत अधिकतम तापमान में 1.8-2.0 डिग्री सेल्सिसयस और न्यूनतम तापमान में 2.0-2.4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी संभावित है। राज्य का पूर्वी हिस्सा तेजी से गर्म हो रहा है। डिंडोरी, भिंड और सीधी जैसे जिले कम अनुकूलन क्षमता के कारण विशेष रूप से जोखिम में हैं।
एक बहु-क्षेत्रीय आकलन के नाम से पर्यावरण विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन केंद्र, एप्को, इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट और दी एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट- टेरी के विशेषज्ञों ने तैयार की है। प्रदूषकों की समस्याओं से निपटने के रास्ते बताए गए हैं। कहा गया है कि शॉर्ट लिव्ड क्लाइमेट पॉल्यूटेंट्स को कम करना जरूरी है। स्थानीय जरूरतों के मुताबिक प्रभावी उपाय लागू किए जाएं तो 2047 तक सामान्य स्थिति की तुलना में सल्फर डाई ऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 80%, नाइट्रोजन ऑक्साइड में 78%, नॉन मीथेन वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड में 61% ब्लैक कार्बन में 56% तक कमी लाई जा सकती है।
रिपोर्ट में नॉन सीओटू प्रदूषकों को कम करने रिन्यूएबल एनर्जी बढ़ाने, बिजली क्षेत्र में गैस के इस्तेमाल, इंडस्ट्री में साफ़ ईंधन और ट्रांसपोर्ट में ईवी अपनाने, पुरानी गाड़ियां हटाने का सुझाव है। प्राकृतिक तरीके से धान की खेती में मीथेन उत्सर्जन 65% तक कम हो सकता है। चारे के सही प्रबंधन से पशुपालन से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में 10-15% की कमी तेजी से और कम लागत में हो सकती है। कम्युनिटी-लेवल पर बायोगैस, एंटरिक फर्मेंटेशन रोकने वाले उपाय, कोयला खदानों से निकलने वाली मीथेन को पकड़ने, जलाने जैसी तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने से ये तीनों सेक्टर 2030 के बाद उत्सर्जन में और ज़्यादा और लंबे समय तक कमी लाने में अहम साबित होंगे।
-अलग-अलग सेक्टर की एसएलसीपी रणनीतियों को राज्य के जलवायु लक्ष्यों के साथ जोड़ने के लिए सेक्टर और विभागों के बीच तालमेल के सिस्टम को मजबूत करना चाहिए।
-खनन, ट्रांसपोर्ट और इंडस्ट्री के लिए सेक्टर-स्पेसिफिक रोडमैप बनाया जाए, जिसमें उत्सर्जन कम करने के लिए समय-सीमा वाले लक्ष्य तय हों।
-पशुपालन, खेती और कोयला खनन जैसे सेक्टर्स में खास तौर पर उत्सर्जन कम करने की रणनीतियां लागू करना चाहिए। ये राज्य में गैर सीओटू उत्सर्जन के ऐसे स्रोत हैं, जिनमें सुधार की सबसे ज्यादा गुंजाइश है, लेकिन जिन पर अब तक कम ध्यान दिया गया है।
-ग्रीन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए राष्ट्रीय मिशनों और केंद्रीय योजनाओं का लाभ उठाना चाहिए और कम-कार्बन वाले इंफास्ट्रक्चर के लिए क्लाइमेट फाइनेंस और सीएसआर फंड जुटाना चाहिए।
-नियम लागू करने और हालात के हिसाब से प्रबंधन के लिए मज़बूत मॉनिटरिंग और मूल्यांकन सिस्टम बनाना जरूरी है, जिसमें रियल-टाइम उत्सर्जन ट्रैकिंग और रिमोट सेंसिंग शामिल हो।
Updated on:
09 Sept 2026 07:43 am
Published on:
09 Sept 2026 07:43 am
