
MP Outsourced Employees- मध्यप्रदेश के ढाई से तीन लाख आउटसोर्स कर्मचारी चाहते हैं कि उन्हें भी नियमित किया जाना चाहिए। (विजुअल एआई जनरेटेड)
MP Outsourced Employees: मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों में कार्यरत ढाई से तीन लाख अस्थायी कर्मचारियों का भविष्य कैसा रहेगा? क्या उन्हें स्थायित्व मिलेगा? क्या उन्हें भी स्वास्थ्य बीमे का लाभ मिलेगा? क्या उन्हें भी बुढ़ापे में पेंशन मिलेगी? क्या उन्हें इस अनिश्चितता से मुक्ति मिलेगी?
यह चिंता उन तीन लाख अस्थाई और आउटसोर्स कर्मचारियों और उनके परिवार की है, जो हर बार अपनी मांगों को लेकर भोपाल आते हैं और खाली हाथ लौट जाते हैं। मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों में कई सालों से सेवाएं दे रहे इन कर्मचारियों के पास नियमित नौकरी की गारंटी नहीं है। सम्मानजनक वेतन भी नहीं है। न ही भविष्य सुरक्षित है। कभी एमपी में दैनिक वेतनभोगियों का शोषण होता था, अब अस्थाई और आउटसोर्स कर्मचारी इसकी भेंट चढ़ गए।
प्रदेशभर से भोपाल आने वाले कई कर्मचारी अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करने आते हैं, लेकिन उन्हें स्टेशन से ही लौटा दिया जाता है। आउटसोर्स अस्थाई कर्मचारी संघ के कर्मचारी अपनी मांगों के लिए राज्य सरकार का ध्यान खींचना चाहते थे, वे मंत्रालय पर प्रदर्शन करने वाले थे। रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर ही मांगों का ज्ञापन ले लिया जाता है। बेचारे कर्मचारी इस उम्मीद से लौट जाते हैं कि शायद उस ज्ञापन के जरिए ही उनकी मांगें मान ली जाएंगी। सवाल उठ रहा है कि सरकार की व्यवस्था चलाने वाले इन कर्मचारियों की खुद की व्यवस्था कब सुधरेगी?
आउटसोर्स अस्थाई कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा कहते हैं कि हम अपनी मांगों के लिए भोपाल में एकत्र हुए थे, लेकिन पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और सभी कर्मचारियों को रोक दिया गया। मध्य प्रदेश तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के महामंत्री उमाशंकर तिवारी भी अस्थाई कर्मचारियों के लिए सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी सरकारी कर्मचारियों की तरह वेतन-भत्ते देना न्यायसंगत होगा। क्योंकि वे भी नियमित कर्मचारियों की तरह ही सरकारी विभागों में काम करते हैं। तिवारी ने कहा कि सरकार जब अपने कर्मचारियों के लिए वेतन बढ़ा रही है, भत्ते बढ़ा रही है, लाडली बहना जैसी कई योजनाओं में करोड़ों रुपए बांट रही है, तो ढाई से तीन लाख अस्थाई कर्मचारियों के लिए क्यों नहीं सोचती? सरकार को इनकी मांगों पर ध्यान देना चाहिए।
आउटसोर्सिंग व्यवस्था व्यवस्था मतलब आवश्यकता अनुसार अस्थाई कर्मचारिओं की सेवाएं लेना और प्रशानिक कार्य में लगाना है। लेकिन उन्हें वेतन देने का कोई पैमाना नहीं है। यह भी है कि ठेका कंपनियों की मनमानी, कटौती और जवाबदेही की कमी की शिकायतें अक्सर आती रहती है। आज के महंगाई के दौर में एजेंसियों को पर्याप्त भुगतान होने के बावजूद वास्तविक वेतन, समय पर भुगतान और सामाजिक सुरक्षा को लेकर शिकायतें भी गंभीर हैं।
इन कर्मचारियों की मांग है कि सबसे पहले उन्हें नियमित किया जाए। जिससे कल चले जाने की चिंता में आज का दिन बर्बाद न हों। न्यूनतम वेतन 26 हजार से 35 हजार रुपए दिया जाना चाहिए। जिससे पूरे परिवार का जीवन सम्मान के साथ गुजर सके। मध्यप्रदेश में दैनिक वेतन भोगी प्रथा तो खत्म हो गई, लेकिन आउट सोर्स प्रथा के कारण मासिक वेतन अथवा समान कार्य के लिए उचित वेतन, भविष्य की सुरक्षा, ठेका प्रथा, सरकारी विभागों में निजीकरण पर रोक आदि की स्पष्ट नीति बनना चाहिए। कर्मचारियों को उम्मीद है कि चुनाव को देखते हुए सरकार हमारे लिए भी राहत का पिटारा खोल देगी।
राज्य सरकार तीन चरणों से इन कर्मचारियों के लिए भी पहल कर सकती है। इसमें वेतन भुगतान और पीएफ-ईएसआई जैसी सुविधाएं हों। दूसरा, कर्मचारियों के अनुभव और कार्य को देखते हुए नियमित करने की नीति बनाना चाहिए। तीसराः ठेका एजेंसियों की जिम्मेदारी तय होना चाहिए और शिकायतों को सुलझाने या सुनवाई के लिए सिस्टम बनाना चाहिए।
Updated on:
12 Oct 2026 06:13 pm
Published on:
12 Oct 2026 06:13 pm
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