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भोपाल। तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट के असंवैधानिक करार देने के बावजूद राजधानी भोपाल में गुस्साए एक युवक ने तलाक, तलाक, तलाक कहकर पत्नी को घर से निकाल दिया...। पति का कहना है कि उसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं पता था, उसने गुस्से में तलाक दिया, अब काजियात में पूछताछ के बाद ही वह पत्नी को साथ रखेगा। आपको जानकर हैरानी होगी कि भोपाल में तलाक का ये पहला मामला है, इस मामले से पहले यहां खुला के तहत पति से तलाक चाहने वाली महिलाओं की संख्या ज्यादा है, जबकि पुरुष द्वारा तलाक के मामले शून्य हैं। पर क्या वाकई कुरान में तलाक-तलाक-तलाक कहनेभर से तलाक जायज है या फिर कुरान में कुछ और हैं तलाक के मायने...खुला और हलाला की हकीकत जानने के लिए जरूर पढ़ें ये खबर...
जानें क्या है मामला
* मुस्लिम समाज में तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद राजधानी भोपाल में तीन बार तलाक कहकर तलाक देने का मामला सामने आया है।
* भोपाल के ऐशबाग इलाके में एक महिला ने पति से बाजार से दूध लाने के लिए पैसे मांगे थे, इस छोटी सी बात पर गुस्साए पति ने उसे मायके से दूध के पैसे लाने कह दिया।
* इसके बाद दूध न होने के कारण काली चाय देने पर गुस्साए शौहर ने पत्नी को तीन बार तलाक बोल दिया।
* मामले में पति ने गुस्से में तीन बार तलाक कहा है, उसका कहना है कि उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में कुछ पता नहीं था। अब वे काजियात में पूछताछ के बाद ही पत्नी को साथ रखेगा...
जानें तीन तलाक, खुला और हलाला का सच...
समाज के विशेषज्ञों का कहना है कि कुरआन में तलाक के हुक्म, खुला और हलाला के हुक्म का लोगों ने मजाक बना लिया है। गुस्से में तलाक या तलाक के तरीके को फौरी तौर पर नहीं बल्कि गहराई से जानने की जरूरत है...
तलाक
* दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब जाहिलियत के दौर में भी तलाक से कोई अनजान नहीं था। उनका इतिहास बताता है कि तलाक का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो आज भी इस्लाम में है। लेकिन कुछ बिदअतें (नए बिंदू) उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थी।
* किसी दंपति में तलाक की नौबत आने से पहले हर किसी की यह कोशिश होनी चाहिए कि जो रिश्ते की डोर एक बार बंध गई है, उसे हर हाल में टूटने से बचाया जाए।
* जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरआन में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायत दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें।
* इसका तरीका कुरआन में यह बताया गया है कि – एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से। वो दोनों जज मिल कर उनमें सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके, वो खानदान के बुजुर्ग और दूसरे लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।
* कुरान ने इसे कुछ यूं बयान किया है – और अगर तुम्हे शौहर-बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे, तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है...(सूरेह निसा-35)।
* इसके बावजूद अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है तो शौहर बीवी के खास दिनों (Menstruation) के आने का इंतजार करे और खास दिनों के गुजर जाने के बाद जब बीवी पाक हो जाए, तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे, यानि शोहर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि मैं तुम्हे तलाक देता हूं।
* तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हजार तलाक बोल देते हैं। यह इस्लाम के खिलाफ किया गया अमल(काम) है और बहुत बड़ा गुनाह है।
* अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता हैं, वो इस्लामी शरीयत और कुरआन का मजाक उड़ाने वाले होते हैं।
* इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानि 3 तीन हैज़ (जिन्हें इद्दत कहा जाता है) और अगर वो प्रेग्नेंट है, तो बच्चा होने तक शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही की जिम्मेदारी होगी। लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे।
* कुरान में सूरेह तलाक में हुक्म फरमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरआन ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।
* अगर इस हुक्म पर गौर किया जाए, तो मालूम होगा कि इसमें बड़ी अच्छी हिकमत है, हर मआशरे(समाज) में बीच में आज भड़काने वाले लोग मौजूद हैं, अगर बीवी तलाक मिलते ही अपनी मां के घर चली जाए, तो ऐसे लोगों को दोनों तरफ कान भरने का मौका मिल जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि बीवी इद्दत का वक्त शौहर ही के घर गुजारे।
* अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हेसियत से साथ रह सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उनको खबर कर दें कि उन्होंने अपना फैसला बदल लिया है।
* कानून में इसे ही रुजू करना कहा जाता है और यह जिंदगी में दो बार ही किया जा सकता है...(सूरेह बक्राह-229)।
*शौहर रुजू ना करे, तो इद्दत के पूरा होने पर शौहर बीवी का रिश्ता खत्म हो जाएगा।
*लिहाजा कुरआन ने यह हिदायत फरमाई है कि इद्दत अगर पूरी होने वाली है, तो शौहर को यह फैसला कर लेना चाहिए कि उसे बीवी को रोकना है या भेजना है, दोनों ही सूरतों में अल्लाह का हुक्म है कि मामला भले तरीके से किया जाए, सूरेह बक्राह में हिदायत फरमाई है कि अगर बीवी को रोकने का फैसला किया है तो यह रोकना बीवी को परेशान करने के लिए हरगिज नहीं होना चाहिए, बल्कि सिर्फ उसकी भलाई के लिए ही उसे रोकने का हुक्म है।
* अल्लाह कुरान में फरमाता है कि -और जब तुम औरतों को तलाक दो और वो अपनी इद्दत के खात्मे पर पहुंच जाएं तो या तो उन्हें भले तरीके से रोक लो या भले तरीके से रुखसत कर दो और उन्हें नुकसान पहुंचाने के इरादे से ना रोको कि उन पर जुल्म करो और याद रखो के जो कोई ऐसा करेगा, वो दर हकीकत अपने ही ऊपर जुल्म ढाएगा।
* और अल्लाह की आयातों को मजाक ना बनाओ, अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद रखो और उस कानून और हिकमत को याद रखो जो अल्लाह ने उतारी है, जिसकी वो तुम्हे नसीहत करता है और अल्लाह से डरते रहो और ध्यान रहे के अल्लाह हर चीज से वाकिफ है... (सूरेह बक्राह-231)।
तो खत्म हो जाएगा रिश्ता...
* अगर उन्होंने इद्दत के दौरान रुजू नहीं किया और इद्दत का वक़्त ख़त्म हो गया, तो अब उनका रिश्ता खत्म हो जाएगा। इस मौके पर कुरआन ने कम से कम दो जगह (सूरेह बक्राह आयत 229 और सूरेह निसा आयत 20 में) इस बात पर बहुत जोर दिया है कि मर्द ने जो कुछ बीवी को पहले गहने, कीमती सामान, रूपए या कोई जाएदाद तोहफे के तौर पर दे रखी थी, उसका वापस लेना शौहर के लिए बिल्कुल जायज नहीं है। वो सब माल जो बीवी को तलाक से पहले दिया था, वो अब भी बीवी का ही रहेगा और वो उस माल को अपने साथ लेकर ही घर से जाएगी, शौहर के लिए वो माल वापस मांगना या लेना या बीवी पर माल वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाना जायज नहीं है।
* हां लेकिन अगर बीवी ने खुद तलाक मांगी थी, जबकि शौहर उसके सारे हक सही से अदा कर रहा था या बीवी खुली बदकारी पर उतर आई थी, जिसके बाद उसको बीवी बनाए रखना मुमकिन नहीं रहा था, तो मेहर के अलावा उसको दिए हुए माल में से कुछ को वापस मांगना या लेना शौहर के लिए जायज है। अब इसके बाद बीवी आजाद है, वो चाहे जहां जाए और जिससे चाहे शादी करे। अब पहले शौहर का उस पर कोई हक बाकी नहीं रहा।
तलाक के बाद दोबारा उसी से शादी
इसके बाद तलाक देने वाला मर्द और औरत जब कभी दोबारा शादी करना चाहें, तो वो कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें आम निकाह की तरह ही फिर से निकाह करना होगा और शौहर को मेहर देने होंगे और बीवी को मेहर लेने होंगे।
* अब अगर दूसरी बार निकाह करने के बाद कुछ समय के बाद उनमे फिरसे झगड़ा हो जाए और फिर से तलाक हो जाए तो फिर से वही पूरा प्रोसेस दोहराना होगा जो ऊपर लिखा है।
* दूसरी बार भी तलाक के बाद वो दोनों आपस में शादी करना चाहें, तो शरियत में तीसरी बार भी उन्हें निकाह करने की इजाजत है। लेकिन अब अगर तलाक हुई, तो यह तीसरी तलाक होगी। जिसके बाद ना तो रुजू किया जा सकता है और न ही आपस में निकाह।
हलाला
* अब चौथी बार उनकी आपस में निकाह करने की कोई गुंजाइश नहीं, लेकिन सिर्फ ऐसे कि अपनी मर्जी से वो औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शौहर भी उसे तलाक दे दे या मर जाए, तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है। इसी को कानून में हलाला कहते है। लेकिन याद रहे यह इत्तिफाक से हो, तो जायज है जानबूझ कर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इसलिए तलाक लेना, ताकि पहले शौहर से निकाह जायज हो सके यह साजिश सरासर नाजायज है और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ऐसी साजिश करने वालों पर लानत फरमाई है।
खुला
* अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे, तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगी, अगर शौहर नेक इंसान होगा, तो जाहिर है वो बीवी को समझाने की कोशिश करेगा और फिर उसे एक तलाक दे देगा, लेकिन अगर शौहर मांगने के बावजूद तलाक नहीं देता, तो बीवी के लिए इस्लाम में यह आसानी रखी गई है कि वो शहर काजी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे। इस्लाम ने काजी को यह हक दे रखा है कि वो उनका रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनकी तलाक हो जाएगी, कानून में इसे खुला कहा जाता है।
Published on:
29 Aug 2017 01:29 pm
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