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किराए की साइकिल से प्रचार करने जाते थे कार्यकर्ता

गेरू या नील से करते थे दीवार लेखन
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banswara

Lok sabha election date in Chhindwara

सैमुअल दास, शिवपुरी. बात 1951 की है। चुनाव में उतरे प्रत्याशी प्रचार के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को किराए की साइकिल दिलवाते थे। कार्यकर्ता इन साइकिलों से गांव-गांव जाकर माहौल बनाते थे। वे अपने साथ गेरू या नील का डिब्बा भी रखते थे, जिससे दीवारों पर प्रत्याशी को वोट देने की अपील लिखते थे। उस समय चुनाव बहुत कम खर्च में हो जाता था।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 92 वर्षीय प्रेमनारायण नागर ने बताया कि आजाद भारत में पहला चुनाव 1951 में हुआ, तब कांगे्रस का चुनाव चिन्ह दो बैल की जोड़ी), हिंदू सभा का चुनाव चिन्ह घुड़सवार और कम्यूनिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह हसिया-हथौड़ा था। तब हिंदू सभा के वीजी देशपांडे ने ग्वालियर व गुना दो सीटों से चुनाव लड़े और जीत हासिल की। कांग्रेस को लगा कि गुना सीट पर हिंदू सभा का कब्जा हो जाएगा तो फिर 1957 में कांग्रेस ने विजयाराजे सिंधिया को चुनाव मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दर्ज कराई। नागर बताते हैं कि 1962 में जीवाजीराव सिंधिया की मृत्यु हो गई तो विजयराजे ग्वालियर से चुनाव जीतीं। उस समय लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ हुआ करते थे और वोटर को दोनों प्रत्याशियों को वोट देने पड़ते थे। सन् 1967 में कांग्रेस में अंदरूनी कलह हुई, क्योंकि विजयराजे ने आठ-दस टिकट मांगे थे, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा ने टिकट नहीं दिए तो विजयराजे ने कांग्रेस छोड़कर स्वतंत्र पार्टी ज्वॉइन कर ली। वे गुना से लोकसभा व करैरा से विधानसभा चुनाव लड़ीं और दोनों चुनाव जीतीं।

- गुड़ चना साथ लेकर चलते थे
बकौल नागर, उस समय प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए कार्यकर्ता को 10-12 दिन के लिए किराए की साइकिल दिलवाते थे। कार्यकर्ता गुड़-चना साथ लेकर जाता था। साइकिल से वो एक दिन में एक गांव पहुंचता था और वहां चौपाल पर बैठकर प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाता। अगले दिन सुबह उस गांव की दीवार पर प्रत्याशी का नाम लिखकर वोट देने की अपील करके अगले गांव की ओर रवाना हो जाता था। रास्ते में भूख लगती तो वो गुड़-चना खा लेता था।
- मतपेटी पर रहता था चुनाव चिन्ह
नागर ने बताया कि उन दिनों मतपेटियों पर संबंधित पार्टी का चुनाव चिह्न भी चिपका रहता था। पेटी पर वोटर की भीड़ से चुनाव परिणाम का अंदाजा लग जाता था। कई वोटर नासमझी में मतपेटी के ऊपर ही अपनी पर्ची रख जाते थे, जिसे नजर बचाकर कई बार दूसरे दल के लोग उन पर्चियों को अपने प्रत्याशी की पेटियों में डाल लेते थे। बाद में पर्चियों की गिनती होती थी।
- 1967 से महंगा हुआ चुनाव
उन्होंने बताया कि सन् 196 7 के बाद से चुनाव महंगा हो गया, क्योंकि उस समय में चुनाव प्रचार के लिए जीपें आ गई थीं और पार्टियों द्वारा अपने प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए कार्यकर्ताओं को जीप में भरकर संसदीय क्षेत्र में पहुंचाया जाता था। एक बार जब जीप से कोई कार्यकर्ता प्रचार कर लेता था तो फिर वो साइकिल से नहीं जाता था। उसके बाद से चुनाव महंगा होता गया और प्रचार-प्रसार के आधुनिक संसाधनों पर प्रत्याशी का खर्चा बढ़ गया।