
आरबीआई एमपीसी की बैठक 5 अक्टूबर से शुरू हो गई है।
RBI Repo Rate: भारतीय रिजर्व बैंक के सामने अक्टूबर की मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट पर फैसला लेना आसान नहीं होगा। महंगाई 4 फीसदी के टार्गेट से ऊपर निकल चुकी है, कच्चे तेल की कीमतें फिर 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं और खुदरा महंगाई बढ़ने की आशंका भी तेज हो रही है। पहली नजर में ये आंकड़े ब्याज दर बढ़ाने की तरफ इशारा करते हैं।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। ब्याज दर बढ़ाने से महंगाई पर कितना असर पड़ेगा, जब मौजूदा महंगाई का बड़ा हिस्सा खाद्य और ईंधन कीमतों से आ रहा है? दूसरी तरफ, ज्यादा ब्याज दर से कर्ज महंगा होगा, EMI बढ़ेगी और कंपनियों के निवेश पर भी दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि अक्टूबर में आरबीआई की दरों को लेकर बहस सिर्फ महंगाई बनाम ग्रोथ की नहीं, बल्कि महंगाई को काबू करने के सही हथियार की भी है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की बैठक आज सोमवार, 5 अक्टूबर से शुरू हो गई है। 7 सितंबर को बैठक में लिये गए फैसलों की घोषणा होगी।
अक्टूबर पॉलिसी मीटिंग से करीब 10 दिन पहले जारी आरबीआई के बुलेटिन में खुदरा महंगाई में व्यापक बढ़ोतरी का संकेत दिया गया है। अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.8 फीसदी हो गई। इसमें खाद्य महंगाई की भूमिका बड़ी रही, जो 5.95 फीसदी पर पहुंच गई। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों ने भी चिंता बढ़ा दी है। जुलाई में करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर से ब्रेंट क्रूड बढ़कर करीब 105 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी गतिरोध को इसके पीछे एक अहम वजह माना जा रहा है।
महंगा कच्चा तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और दूसरी वस्तुओं की लागत पर भी पड़ सकता है। महंगाई का दायरा बढ़ने के संकेत भी मिल रहे हैं। अगस्त में CPI बास्केट की करीब 40 फीसदी वस्तुओं की महंगाई 4 फीसदी से ऊपर थी। जुलाई में यह आंकड़ा 32 फीसदी था।
श्रीराम ग्रुप की मुख्य अर्थशास्त्री अपूर्वा जावड़ेकर आरबीआई के पास ब्याज दर बढ़ाने की एक वजह ग्रोथ भी है। महंगाई के दबाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल कमजोर तस्वीर नहीं दिखा रही है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही। सितंबर तक के कई हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स भी आर्थिक गतिविधियों में मजबूती की ओर इशारा कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि आरबीआई के पास महंगाई पर फोकस करने की कुछ गुंजाइश है। दरों में बढ़ोतरी से अगर ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी भी होती है, तो फिलहाल अर्थव्यवस्था के पास उसे सहने की क्षमता दिख रही है।
अपूर्वा के अनुसार, एक और चिंता रियल इंटरेस्ट रेट को लेकर है। अगस्त में यह करीब 0.4 फीसदी रह गया, जबकि कोविड से पहले इसका औसत करीब 2.1 फीसदी था। बहुत सस्ता कर्ज कुछ सेक्टर में जरूरत से ज्यादा तेजी पैदा कर सकता है। इससे भी आरबीआई को सतर्क रहने की वजह मिलती है।
यहीं से तस्वीर पलटती है। महंगाई बढ़ जरूर रही है, लेकिन अब तक इसका रुख आरबीआई के पहले लगाए गए अनुमान से बहुत अलग नहीं रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची नहीं रहती हैं, तो अभी ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत कितनी है?
अगस्त की महंगाई में सबसे ज्यादा योगदान देने वाली 10 वस्तुओं का हिस्सा करीब 50 फीसदी है। पिछले कुछ महीनों में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली है। इसका मतलब यह हो सकता है कि महंगाई का मौजूदा उछाल अभी व्यापक मांग के बजाय कुछ खास वस्तुओं की कीमतों और सप्लाई से ज्यादा जुड़ा हुआ है। अगर महंगाई की जड़ सप्लाई साइड में है, तो ब्याज दर बढ़ाकर उसे कितना दबाया जा सकता है, यह बड़ा सवाल है।
आरबीआई के लिए दूसरी चिंता ग्रोथ की है। भारत की आर्थिक वृद्धि में कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी कंपनियों का निवेश अहम भूमिका निभा रहा है। अपूर्वा के अनुसार, ब्याज दरें बढ़ने से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा होगा। इसका असर खासकर MSME सेक्टर पर पड़ सकता है। अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी लंबे समय तक जारी रहती है, तो कंपनियां नई फैक्ट्री, मशीनरी और विस्तार से जुड़े फैसलों को टाल सकती हैं।
निर्यात के मोर्चे पर भी पहले से चुनौतियां हैं। अमेरिका की ओर से संभावित 100 फीसदी टैरिफ का खतरा भी बना हुआ है। निर्यात पर पहले से दबाव हो तो ब्याज दर बढ़ाना ग्रोथ के लिए एक और मुश्किल खड़ी कर सकता है।
ब्याज दर बढ़ने का असर सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। इसका सबसे सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनके पास होम लोन, पर्सनल लोन या दूसरे फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज हैं। कोविड से पहले घरेलू कर्ज जीडीपी के करीब 36 फीसदी के बराबर था, जो अब बढ़कर 45 फीसदी तक पहुंच गया है। साथ ही बैंकिंग सिस्टम में फिक्स्ड रेट की जगह फ्लोटिंग रेट वाले लोन का हिस्सा काफी बढ़ चुका है। ऐसे में आरबीआई द्वारा रेट बढ़ाते ही नए कर्ज की लागत बढ़ने के साथ पुराने फ्लोटिंग रेट लोन की ईएमआई पर भी असर पड़ सकता है।
आरबीआई के सामने एक और सवाल है। अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ जापान की नीतियों में बदलाव होता है, तो क्या भारत को भी उसके हिसाब से ब्याज दर बढ़ानी चाहिए? जावड़ेकर के अनुसार, दलील यह दी जाती है कि भारत और दूसरे देशों के बीच ब्याज दर का अंतर कम होने पर विदेशी निवेश बाहर जा सकता है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन सिर्फ इस वजह से दर बढ़ाने का तर्क बहुत मजबूत नहीं दिखता।
जावड़ेकर के अनुसार, भारत की पॉलिसी रेट पहले ही एशिया के कई देशों की तुलना में ऊंची है। थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया ने अपनी हाल की बैठकों में दरों में बदलाव नहीं किया है। इसके बावजूद भारत का सापेक्ष ब्याज दर लाभ बना हुआ है। भारत के पास करीब 785 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भी है, जिससे जरूरत पड़ने पर रुपये में ज्यादा उतार-चढ़ाव को संभालने की क्षमता मिलती है।
आखिरकार बहस दो सवालों पर आकर टिकती है। पहला, अगर महंगाई मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन जैसी सप्लाई से जुड़ी वजहों से बढ़ रही है, तो क्या ब्याज दर बढ़ाने से वास्तव में उसे रोकने में बड़ी मदद मिलेगी? दूसरा, अगर लंबे समय तक ब्याज दर बढ़ाना ग्रोथ के लिए महंगा पड़ सकता है, तो सिर्फ 50 बेसिस पॉइंट की छोटी बढ़ोतरी का मकसद क्या होगा? क्या यह सिर्फ बाजार को सख्त रुख का संकेत देने के लिए होगी?
अक्टूबर की MPC बैठक में RBI के फैसले की दिशा इन्हीं सवालों के जवाब से तय हो सकती है। आंकड़े दर बढ़ाने की वजह जरूर दे रहे हैं, लेकिन ग्रोथ, EMI और सप्लाई से जुड़ी महंगाई का जोखिम भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस बार आरबीआई के लिए नाप-तौलकर कदम उठाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।
Updated on:
05 Oct 2026 03:13 pm
Published on:
05 Oct 2026 03:07 pm
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