
पिछले 10 महीने में सेंसेक्स काफी गिर गया है। (PC: AI)
Share Market Outlook: भारतीय शेयर बाजार अपने रिकॉर्ड हाई से 11,000 अंक से ज्यादा नीचे आ चुका है। सेंसेक्स ने 86,159 का रिकॉर्ड स्तर छुआ था, लेकिन इसके बाद बाजार की तस्वीर बदल गई। लगातार बिकवाली के दबाव में 30 शेयरों वाला यह इंडेक्स 75,000 के नीचे तक फिसल गया। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि आखिर कौन से फैक्टर बाजार की दिशा फिर बदल सकते हैं। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, तीन चीजें हो जाएं तो भारतीय शेयर बाजार को राहत मिल सकती हैं। इनमें विदेशी निवेशकों की बिकवाली का रुख बदलना, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जुड़ा संकट खत्म होना शामिल है।
भारतीय शेयर बाजार पर लंबे समय से कई घरेलू और वैश्विक दबाव बने हुए हैं। इनमें सबसे बड़ा झटका अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी 2026 में शुरू हुए युद्ध से लगा। इसके बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में तेल की आवाजाही प्रभावित हुई और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। महंगा तेल यानी महंगाई बढ़ने का खतरा। इसका असर सरकारी वित्तीय स्थिति से लेकर डॉलर भंडार तक पर पड़ा।
तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से पैसा निकालना तेज किया। नतीजा यह रहा कि सेंसेक्स और निफ्टी समेत दूसरे प्रमुख इंडेक्स भी दबाव में आ गए। हालांकि, भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.80% रही, फिर भी विदेशी निवेशकों का भरोसा पूरी तरह वापस नहीं आया है। अब सवाल यह है कि बाजार की गाड़ी फिर पटरी पर कैसे लौटे?
भारतीय बाजार के लिए सबसे अहम संकेत विदेशी निवेशकों के रुख में बदलाव हो सकता है। FIIs और FPIs लंबे समय से भारतीय शेयरों में बिकवाली कर रहे हैं। पहले विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी भारत की जगह साउथ कोरिया जैसे बाजारों में बढ़ी थी। इसकी एक वजह एआई से जुड़ी कंपनियों को लेकर बनी तेजी थी। अब एआई सेक्टर की तेजी को लेकर भी बाजार में सवाल उठ रहे हैं, लेकिन विदेशी निवेशकों का भारत को लेकर रुख अभी पूरी तरह नहीं बदला है।
Basav Capital के फाउंडर संदीप पांडे के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार फिलहाल एफपीआई और एफआईआई के निवेश पैटर्न में बदलाव का इंतजार कर रहा है। उनका कहना है कि विदेशी निवेशक एक साल से ज्यादा समय से भारत और कुछ दूसरे उभरते बाजारों के रिटर्न को लेकर सतर्क हैं। भारत सरकार की ओर से NRI के FCNR बॉन्ड के जरिए डॉलर लाने की कोशिश हुई है, लेकिन यह लंबे समय का समाधान नहीं है। पांडे के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की वापसी के लिए ऐसे बड़े सुधार जरूरी होंगे, जिनसे भारतीय बाजार में पोर्टफोलियो निवेश ज्यादा आकर्षक बने। अगर विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली थमती है और वे फिर भारतीय शेयरों में पैसा लगाना शुरू करते हैं, तो बाजार के सेंटीमेंट में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
दूसरा बड़ा फैक्टर अमेरिका की बॉन्ड यील्ड है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स लंबे समय से ऊंचे स्तर पर हैं। बाजार में यह चिंता भी है कि अगर यील्ड बहुत ज्यादा समय तक ऊंची बनी रहती है, तो अमेरिका की कर्ज संबंधी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जेफरीज के क्रिस्टोफर वुड ने भी अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने इस बात की संभावना पर चर्चा की है कि अमेरिकी प्रशासन बॉन्ड यील्ड को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकता है।
अगर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी आती है, तो इसका असर डॉलर पर भी पड़ सकता है। ऐसे माहौल में निवेशकों को इक्विटी और सोने जैसे दूसरी एसेट क्लास ज्यादा आकर्षक लग सकते हैं।
सेबी रजिस्टर्ड मार्केट एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, अगर अमेरिकी सरकार ट्रेजरी यील्ड को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाती है तो इससे डॉलर पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में वैश्विक निवेशकों की नजर उन उभरते बाजारों पर जा सकती है, जहां शेयर पहले से दबाव में हैं। भारत भी इसी दायरे में आता है। यानी अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव का असर सीधे तौर पर दलाल स्ट्रीट के सेंटीमेंट पर पड़ सकता है।
तीसरा और बेहद अहम फैक्टर है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ने के बाद इस रणनीतिक जलमार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित हुई। इसका असर सिर्फ युद्ध में शामिल देशों पर नहीं पड़ा, बल्कि दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका दबाव आया। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई का खतरा बढ़ा। साथ ही भारत जैसे तेल आयातक देशों के व्यापार संतुलन, राजकोषीय स्थिति और डॉलर की जरूरत पर भी दबाव बढ़ा। पेस 360 के मुख्य वैश्विक रणनीतिकार अमित गोयल का मानना है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर मौजूदा गतिरोध लंबे समय तक चलना मुश्किल हो सकता है।
उनके मुताबिक, अमेरिका के लिए युद्ध को लगातार जारी रखना आसान नहीं होगा, खासकर जब वहां मध्यावधि चुनाव नजदीक आ रहे हैं। दूसरी ओर ईरान भी इस स्थिति को बातचीत के लिए अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहेगा। बाजार इसी वजह से हॉर्मुज संकट के समाधान की उम्मीद लगाए बैठा है। अगर यहां से तेल की सप्लाई सामान्य होती है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो महंगाई को लेकर दबाव कुछ कम हो सकता है। इसका फायदा वैश्विक बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार को भी मिल सकता है।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)
Updated on:
23 Sept 2026 06:13 pm
Published on:
23 Sept 2026 06:02 pm
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