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Medicine Price Explained: दवा की MRP कौन तय करता है और मरीज को इतनी महंगी क्यों पड़ती है?

Medicine Price Control in India: सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों के बीच बड़े अंतर पर केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं। अदालत ने NPPA के कामकाज की भी आलोचना की है। जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत सरकार तय करती है।
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भारत

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Pawan Jayaswal

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Updated: 28 Oct 2026, 5:40 PM IST

Hospital Medicine Overcharging

जरूरी दवाओं की कीमतें सरकार तय करती है। (PC: AI)

Supreme Court on Drug Pricing: दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों पर नजर रखने वाली संस्था नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं। पीठ ने इसकी कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए पूछा कि दवाओं की कीमत तय करने वाली व्यवस्था दवा कंपनियों के पक्ष में क्यों दिखाई देती है। अदालत दवाओं की कीमतों और आम लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने से जुड़ी दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

अस्पतालों में महंगी दवाएं बेचने पर सरकार ने भी जताई चिंता

अस्पतालों में मरीजों से दवाओं और मेडिकल सामान के लिए अधिक कीमत वसूले जाने की बात सरकार ने भी कही है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में इसे गलत प्रैक्टिस बताया था। सरकार के मुताबिक, वह इस समस्या से अवगत है और इससे निपटने के लिए संबंधित पक्षों के साथ मिलकर समाधान तलाश रही है। केमिकल एवं उर्वरक मंत्रालय ने अपने हलफनामे में इस विरोधाभास की ओर भी ध्यान दिलाया कि भारत सस्ती दवाएं बनाने वाले बड़े देशों में शामिल है, लेकिन देश के मरीजों को कई बार दवाओं के लिए उनकी उत्पादन लागत से काफी अधिक रकम चुकानी पड़ती है।

दवाओं की कीमत कौन तय करता है?

जरूरी दवाओं के मामले में सरकार की ओर से एनपीपीए MRP यानी अधिकतम खुदरा कीमत तय करती है। दूसरी दवाओं की कीमत मैन्यूफैक्चरर कंपनी खुद तय करती है, लेकिन उसे सरकारी नियमों के दायरे में रहना पड़ता है। कंपनी इन दवाओं की कीमत में हर साल एक तय प्रतिशत की ही बढ़ोतरी कर सकती है। दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था मुख्य रूप से तीन पक्षों पर निर्भर करती है।

सरकार (एनपीपीए ): दवाओं की कीमतों से जुड़े नियम बनाती है और जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने की व्यवस्था चलाती है।
दवा मैन्यूफैक्चरर कंपनी: नियमों के दायरे में दवा की कीमत तय करती है और पैकेट पर MRP छापती है।
डिस्ट्रीब्यूटर, थोक विक्रेता और मेडिकल स्टोर: दवा की खरीद और बिक्री के बीच मिलने वाले अंतर से कमाई करते हैं। अस्पतालों की फार्मेसी भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है।

इस पूरी व्यवस्था को ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत लागू किया जाता है। इसकी निगरानी NPPA करती है।

जरूरी दवाओं की कीमत पर सरकार का है कंट्रोल

राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) में शामिल दवाओं को DPCO की अनुसूची-1 में रखा जाता है। इन दवाओं के लिए एनपीपीए अधिकतम कीमत यानी सीलिंग प्राइस तय करती है। मैन्यूफैक्चरर इस तय सीमा से कम कीमत पर दवा बेच सकता है, लेकिन निर्धारित अधिकतम कीमत से ऊपर नहीं। कीमत तय करने में बाजार में उपलब्ध संबंधित दवाओं और उनकी बिक्री के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाता है। इन दवाओं की कीमतों में सालाना बदलाव थोक मूल्य सूचकांक (WPI) से भी जुड़ा होता है। इसलिए निर्धारित अधिकतम कीमत में समय के साथ बढ़ोतरी या कमी हो सकती है।

ज्यादातर दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं

हर दवा पर सरकार का सीधा प्राइस कंट्रोल नहीं है। जो दवाएं DPCO की अनुसूची-1 में शामिल नहीं हैं, उन्हें गैर-अनुसूचित दवाएं कहा जाता है। इनकी एमआरपी मैन्यूफैक्चरर कंपनी तय करती है। हालांकि, ऐसी दवाओं की कीमत में किसी भी 12 महीने की अवधि में 10 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी नहीं की जा सकती। लेकिन यह नियम शुरुआती कीमत को एक समान नहीं बनाता। इसी वजह से एक ही साल्ट वाली दो दवाओं की एमआरपी में बड़ा अंतर हो सकता है। अगस्त 2026 में राज्यसभा में केंद्र सरकार ने दवाओं की कीमतों से जुड़े इन नियमों की जानकारी दी थी।

कितनी दवाएं सीधे प्राइस कंट्रोल के दायरे में हैं?

संसद की रसायन एवं उर्वरक संबंधी स्थायी समिति की 6 अगस्त 2026 को पेश 33वीं रिपोर्ट के हवाले से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अनुसूचित दवाओं की हिस्सेदारी कुल दवा बाजार में करीब 18 फीसदी है। बाकी लगभग 82 फीसदी बाजार गैर-अनुसूचित दवाओं का है, जिन पर मुख्य रूप से सालाना 10 फीसदी बढ़ोतरी की सीमा लागू होती है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में निर्माता कंपनियों की अहम भूमिका रहती है। यही वजह है कि दवाओं की कीमतों में अंतर और मरीजों पर पड़ने वाले खर्च को लेकर सवाल उठते हैं।

एक ही साल्ट वाली अलग-अलग ब्रांड की दवा की कीमत में अंतर क्यों?

एक ही बीमारी में इस्तेमाल होने वाली या एक ही साल्ट वाली दवाओं की कीमत अलग होने के कई कारण हैं।

अलग-अलग कंपनियां: हर निर्माता अपने ब्रांड की शुरुआती कीमत खुद तय करता है।
लॉन्च का समय: अलग-अलग समय पर बाजार में आई दवाओं की शुरुआती कीमतें अलग हो सकती हैं।
सालाना बढ़ोतरी की सीमा: 10 फीसदी की सीमा कीमत में सालाना बढ़ोतरी को कंट्रोल करती है, शुरुआती कीमत को नहीं।
डिस्ट्रीब्यूशन मार्जिन: अलग-अलग ब्रांड के लिए डिस्ट्रीब्यूटर्स और रिटेलर्स के मार्जिन अलग हो सकते हैं।
जेनेरिक दवाएं: कई जेनेरिक और ट्रेड-जेनेरिक दवाएं कम कीमत पर बेची जाती हैं, ताकि ज्यादा बिक्री हो सके।

क्या मेडिकल स्टोर या अस्पताल MRP से ज्यादा कीमत ले सकते हैं?

नहीं। नियमों के अनुसार कोई भी विक्रेता दवा पर छपी एमआरपी से अधिक कीमत नहीं वसूल सकता। हालांकि, एमआरपी से कम कीमत पर दवा बेचना वैध है। इसी वजह से ऑनलाइन फार्मेसी, बड़ी दवा दुकानें और कुछ सरकारी योजनाएं दवाओं पर छूट दे सकती हैं। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत चलने वाले जनऔषधि केंद्रों पर जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड विकल्पों के मुकाबले काफी कम कीमत पर मिल सकती हैं।