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चूरू की वह ऐतिहासिक व्यायामशाला, जहां कभी गढ़े जाते थे ‘बंगाल टाइगर’; आज क्यों वीरान है?

राजस्थान के चूरू शहर की ऐतिहासिक 'हनुमान व्यायामशाला' आज अपनी पहचान खोती नजर आ रही है। कभी यह अखाड़ा खेल परंपरा और अनुशासन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इसी मिट्टी से भगवानदास मड़दा और उनके पुत्र पुरुषोत्तम मड़दा जैसे शरीर-सौष्ठव के दिग्गज निकले, जिन्होंने कोलकाता की प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर 'बंगाल टाइगर' का खिताब जीता।
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चूरू

•

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Arvind Rao

•

Oct 07, 2026

hanuman vyayamshala churu

चूरू की व्यायामशाला (पत्रिका फोटो)

Hanuman Vyayamshala Churu: स्थापत्य कला संस्कृति की संवाहक चूरू की पहचान केवल हवेलियों, देवालयों सहित अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए ही नहीं रही, बल्कि यहां की खेल परंपरा का भी देश-प्रदेश में खास स्थान रहा है।

चूरू शहर की व्यायाम और खेल परंपरा अनूठी रही है। कभी यहां सुबह होते ही युवाओं की भुजाएं फड़कती थीं, अखाड़े में दांव-पेंच चलते थे और वॉलीबॉल में खिलाड़ियों की गूंज सुनाई देती थी। लेकिन इस परंपरा का प्रमुख केंद्र रही चूरू व्यायामशाला आज अपनी पुरानी पहचान खोती नजर आ रही है।

चूरू की व्यायाम परंपरा की शुरुआत हनुमान व्यायामशाला से मानी जाती है, जो लोहियों की बगीची में संचालित होती थी। बाद में प्रवासी चूरूवासी दीनानाथ बागला के पुत्रों ने उनकी स्मृति में वर्तमान व्यायामशाला का निर्माण करवाया और आवश्यक उपकरण भी उपलब्ध करवाए।

इस व्यायामशाला ने चूरू को ऐसे खिलाड़ी दिए, जिनकी गूंज बंगाल तक पहुंची। भगवानदास मड़दा व्यवसाय के सिलसिले में कोलकाता गए। वहां भी उन्होंने व्यायाम जारी रखा और प्रांतीय स्तर की प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर 'बंगाल टाइगर' की उपाधि हासिल की। रामगोपाल मड़दा अच्छे बॉडीबिल्डर थे।

पिता की परंपरा को उनके पुत्र पुरुषोत्तम मड़दा ने आगे बढ़ाया। करीब 1953-54 में उन्होंने भी शरीर सौष्ठव में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर 'बंगाल टाइगर' का खिताब हासिल किया। उनकी प्रतिभा ऐसी थी कि कोलकाता की व्यायामशाला के प्रशिक्षक ने उनसे शुल्क लेने के बजाय उन्हें युवाओं का मार्गदर्शक बना लिया। उन्हें भारत की ओर से रूस जाने वाले खिलाड़ियों में भी शामिल किया गया था, लेकिन पारिवारिक कारणों से वे विदेश नहीं जा सके।

कभी व्यायामशाला में दंड-बैठक, कुश्ती, वॉलीबॉल, मालिश और देसी कसरत का नियमित दौर चलता था। व्यायाम के बाद युवाओं को भीगे चने मिलते थे और नत्थू पहलवान कुश्ती के दांव-पेंच सिखाते थे। यह स्थान केवल कसरत का केंद्र नहीं, बल्कि अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली की पाठशाला था। समय के साथ व्यवस्था कमजोर हुई और व्यायामशाला धीरे-धीरे निष्क्रिय होती चली गई। उपकरण भी खुर्द-बुर्द हो गए और कभी युवाओं से गुलजार रहने वाला परिसर सूना पड़ गया।

आज जरूरत है कि इस ऐतिहासिक व्यायामशाला का जीर्णोद्धार हो, आधुनिक उपकरण लगें, अखाड़ा फिर आबाद हो और वॉलीबॉल की आवाज लौटे। चूरू की इस विरासत को संवारकर नई पीढ़ी को बताया जा सकता है कि इसी मिट्टी ने कभी दो-दो 'बंगाल टाइगर' दिए थे।

अखाड़े में होती थी कुश्ती

चूरू की व्यायामशाला में उस समय योगाभ्यास करवाया जाता था, जब योग को कोई जानता भी नहीं था। महादेवप्रसाद ओझा व्यायाम करवाया करते थे। इस व्यायामशाला में कुश्ती का अखाड़ा चलता था और सुबह नियमित रूप से पहलवानों के बीच कुश्ती हुआ करती थी। प्रवासी जब चूरू आते तो वे व्यायामशाला अवश्य आते थे। व्यायामशाला में वॉलीबॉल खूब खेला जाता था। यह व्यायामशाला क्षेत्र में खास पहचान रखती थी।

-ठाकुरमल शर्मा, सचिव, जिला ओलम्पिक संघ, चूरू